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हृदय नारायण की पांडुलिपियों को दिया पुस्तक का रूप
स्वतंत्रतासेनानीऔर साहित्यकार हृदय नारायण की 16वीं पुण्यतिथि पर उनकी दो महत्वपूर्ण रचनाएं ‘जीवन-मृत्यु के बीच मैं’ और ‘हम और हमारा परमात्मा’ का पुस्तक के रूप में विमोचन किया गया। विमोचन समारोह का आयोजन बीआईए सभागार में आयोजित किया गया था। उनकी यह दोनों रचनाएं मूल रूप से पांडुलिपि में हैं जो नष्ट होने के कगार पर हैं। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में बिहार धार्मिक न्यास पर्षद के अध्यक्ष आचार्य किशोर कुणाल ने शिरकत की।
समाजमें मूल्यों का निर्माण करेगा पुस्तक
इसअवसर पर श्री कुणाल ने कहा कि हृदय नारायण जी समाज के पथ प्रदर्शक थे। उनकी लोकप्रियता समाज के हर बर्ग और हर आयु में थी। उन्होंने पौराणिक मूल्यों की चर्चा करते हुए कहा कि पौराणिक ग्रंथों में उल्लेखित जीवन मूल्य आज भी प्रासंगिक है। समाज में आज मूल्यों की गिरावट तेजी से हो रही है, ऐसे में यह पथ प्रदर्शक का काम करेगी।
संजीदापुस्तक की समाज में कमी
अतिथियोंका स्वागत करते हुए डॉ. निगम प्रकाश नारायण ने कहा कि नई पीढ़ी की रुचि साहित्य और समाज में घटती जा रही है। वह उन संगोष्ठी में नहीं जाना पसंद करते जहां मूल्यों और समाज की बात होती है। आज के युवा को पुराने साहित्य से जुड़ना चाहिए। वहीं मानवाधिकार आयोग के पूर्व सदस्य न्यायमूर्ति राजेंद्र प्रसाद ने दोनों पुस्तकों की समीक्षा करते हुए कहा कि आज के दिनों में ऐसी किताबें कम मिलती है। आज संजीदा किताबों की कमी हो गई है जो मूल्यों और चरित्र का निर्माण करता हो। कार्यक्रम में पटना विवि के पूर्व कुलपति डॉ. एस एन पी सिन्हा, बिहार के पूर्व निर्वाचन आयुक्त जिया लाल आर्य, बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष डॉ. अनिल सुलभ, डॉ. शिववंश पांडेय, डॉ. संगीता नारायण, नरेश चकोर, मोहन प्रेमयोगी, राज कुमार प्रेमी, अजय कुमार, प्रो. अरूण सिन्हा आदि लोग उपस्थित थे।
बीआईए में पुस्तक का लाेकार्पण करते न्यायाधीश राजेन्द्र प्रसाद, अनिल सुलभ, जिया लाल आर्य, अाचार्य किशोर कुणाल, डॉ. निगम प्रकाश नारायण, डॉ. शिववंश पांडेय, बलभद्र कल्याण सत्यनारायण (बाएं से दाएं)।
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