पटना. उद्योग मंत्री डॉ. भीम सिंह ने कहा कि नीतीश कुमार का वीभत्स चेहरा लोगों के सामने गया है। सत्ता पाने के लिए वे क्या कुछ कर सकते हैं, यह पूरा देश देख रहा है। वह नैतिकता की लड़ाई में चारों खाने चित्त हो गए हैं। यदि उन्हें मुख्यमंत्री बनना ही था तो ऐसा षड्यंत्र रचने की क्या जरूरत थी? मांझी ने कहा था कि नीतीश कहते तो वे खुद कुर्सी छोड़ देते। मंत्री ने मांझी को संग्रामी पुरुष बताया और कहा कि उन्होंने राज्यभर में दलितों-महादलितों में स्वाभिमान जगाया है। यह ऐसे व्यक्ति को कैसे पच सकता है, जिसे वोट तो चाहिए लेकिन उनका सशक्तीकरण नहीं।
भीम सिंह ने कहा- पहले मांझी को अस्थिर करने का प्रयास होता था तो लगता था कि नीतीश कुमार के नाम पर दूसरे राजनीतिक रोटी सेंक रहे हैं। अब यह स्पष्ट हो गया कि इन सबके पीछे खुद नीतीश थे। जिस समय वे मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ रहे थे, हमने विरोध किया। उन्होंने कहा था कि अब वे जनता का विश्वास पाकर वापस आएंगे। हमने विश्वास किया। पर नैतिक पतन का ये उदाहरण नहीं मिल सकता।
उन्होंने कहा कि नीतीश ने मांझी को ‘दहज’ देने (रौंदने) का षड्यंत्र रचा, ताकि वे डरकर भाग जाएं और नीतीश फिर सीएम बन सकें। मांझी के कारण नीतीश डिप्रेशन में थे और उनमें हीनता का भाव पैदा हो गया था। उनकी छटपटाहट ने उनके चरित्र पर दोहरा दाग लगा दिया है।
मंत्री ने कहा कि दलित अधिकारियों को सोचना चाहिए कि सीएम को अपमानित करने का षड्यंत्र रचा जा सकता है तो फिर उनकी क्या बिसात? अति पिछड़े लोग भी सोचें। जदयू संविधान का हवाला दिया जा रहा है, लेकिन शरदजी बताएं कि इसका प्रयोग शंबुक वध के लिए ही क्यों?
कर्पूरी जयंती में मांझी को नहीं मिली तौलिए वाली कुर्सी
भीमसिंह ने कहा कि पिछले दिनों कर्पूरी जयंती में चार कुर्सी तौलिए वाली लगी थी। हमें लगा कि शरद, नीतीश, मांझी और वशिष्ठ के लिए होगी। पर, कुर्सी पर बैठ गए ललन सिंह। मांझी को सामान्य कुर्सी दी गई। यह क्या है? क्या महादलित का अपमान नहीं?
6 माह तक तो मंत्रियों को भी समय नहीं देते थे नीतीश
भीमसिंह ने कहा कि विधायक अपना अपमान भूले नहीं हैं। उन्हें नीतीश कुमार से मिलने के पहले सोचना पड़ता था। मंत्री के रूप में वे खुद छह माह तक समय मांगते रहे हैं।