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नाटक सद्‌गति में दिखा दलितों का शोषण

7 वर्ष पहले
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दलितों को नीच जाति का कहते हुए कैसे उनपर अत्याचार होता है, इसे दिखाते कलाकार।

कालिदास रंगालय में प्रेमचंद की कहानी पर आधारित नाटक को देखने अच्छी संख्या में पूरे परिवार के साथ पहुंचे लोग। महिलाओं की उपस्थिति रही अच्छी।

डीबी स्टार > पटना

क्यादलितहोना ही अपराध है? दलित से बेगार काम लेने में बड़ी जातियों के धर्म भ्रष्ट नहीं होते लेकिन वहीं अगर उनके कुएं का पानी पी ले छुआछूत मानेंगे। यह कैसा न्याय है, दलितों को नीच जाति का कह उनपर अत्याचार होता रहे, अत्याचार भी वह करें जो खुद को बड़ी जाति का कुलीन और सभ्य कहते हैं। कमजोरों पर अत्याचार करने वक्त इन सभ्य और खुद को बड़ा मानने वालों का दिल क्यों नहीं पसीजता?

इन्हीं सवालों पर केंद्रित नाटक सद्‌गति का मंचन गुरुवार को कालिदास रंगालय में हुआ। थियेटर एजुकेशनल एंड मीडिया की आेर से मंचित इस नाटक के निर्देशक थे उदय सिंह और राज मर्चेंट। प्रेमचंद की कहानी पर आधारित इस नाटक के नाट्यकार है अनिल ओझा। नाटक सवाल उठाता है कि आखिर क्यों जाति के नाम पर दलितों के साथ हजारों वर्षों से अमानवीय व्यवहार होता आया है? नाटक कहता है कहीं कहीं किसी किसी रूप में यह शोषण आज भी बरकरार है।

यहथी कहानी

दलितजाति से आने वाला हरखू बेहद ही बीमार और प्यासा है। उसे पानी पिलाने के लिए उसका बेटा झरखू गांव में ठाकुर के कुएं से पानी चुराकर लाने जाता है, क्योंकि कुएं से पानी लेना दलितों के लिए वर्जित है। पानी लाने गए झरखू को ठाकुर पकड़ लेता है और कुएं से पानी लेने के जुर्म में बेरहमी से मारता-पीटता है। इससे भी मन नहीं भरता तो पंडित दाता दीन के पास उसे दंड देने के लिए भेज देता है। उधर प्यास से तड़प कर हरखू मर जाता है। वहीं पंडित दाता दीन झरखू से अपने यहां दिन भर अपने घर पर लकड़ी चीड़ने समेत कई काम करवाता है, वह भी बिना कुछ खाना-पीना दिए हुए।

पंडिताइन मना करती है कि झरखू मर जाएगा उससे अब काम मत करवाओ। लेकिन, पंडित दातादीन का दिल नहीं पसीजता। भूखा-प्यासा काम कर रहा झरखू खाने के लिए मांगता है तो उसे दुत्कार मिलती है, अंत में भूख प्यास और अत्यधिक मेहनत करने के कारण झरखू भी मर जाता है।

येथे कलाकार

राजमर्चेंट, उदय कुमार सिंह, अनिता सिंह, इंद्रजीत कुमार, आशीष राज, सान्या सिन्हा, रंजन कुमार और हर्ष झा।