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सिनेमाघर क्यों टूट रहे यह सोचने की जरूरत
कार्यशाला में छात्र-छात्राओं ने बढ़-चढ़कर लिया हिस्सा।
गांव सिनेमा से पेश की मिसाल
कार्यशाला में पूर्णिया के किसान और पत्रकारिता से जुड़े रहे गिरींद्र नाथ झा ने अपने गांव सिनेमा के बारे में बताया जिसमें वह लैपटॉप पर बच्चों को फिल्म दिखाते हैं। उन्होंने कहा कि यह एक छोटा प्रयास है पर उसके परिणाम आश्चर्यजनक है। जब पहली बार स्वदेश फिल्म को अपने गांव के बच्चों को दिखाया तो उसके बाद उन्हें बिजली और बल्ब के बारे में जानकारी हुई।
फिल्में हैं संचार का सशक्त माध्यम
कार्यशाला के उद्देश्यों पर प्रकाश डालते हुए यूनिसेफ की निपुण गुप्ता ने कहा कि फिल्में बच्चों को प्रेरणा देती हैं, यह संचार का सबसे सशक्त माध्यम है। यह वर्ष संयुक्त राष्ट्र बाल अधिकार समझौते की 25वीं वर्षगांठ के रूप में मनाया जा रहा है। हमें सोचना होगा कि बच्चों के अधिकारों के बारे में फिल्में क्या भूमिका निभा सकती है।
gufi in patna
कार्यशाला में उपस्थित विनय विंध्याचल, गूफी पेंटल, टोनी शर्मा, मंत्री विनय बिहारी, निपुण गुप्ता। (बाएं से)
डीबी स्टार > पटना
राज्यमेंतेजी से सिनेमाघर टूट कर मल्टी स्टोर बिल्डिंग बन रहे हैं। सिनेमाघर क्यों टूट रहे हैं यह सोचने की जरूरत है। इनकी घटती संख्या या इनके घाटे में जाने का बड़ा कारण हैं बिहार में सिनेमाघरों पर लगने वाला कंपाउंडिंग टैक्स। इस टैक्स के कारण फिल्में चले या नहीं चले सरकार के खाते में हर सप्ताह इन्हें यह टैक्स देना पड़ता है। बिहार के अलावा देश के किसी राज्य में सिनेमाघर को कंपाउंडिंग टैक्स नहीं देना पड़ता।
यह बातें सोमवार को कला संस्कृति मंत्री विनय बिहारी ने कही। वह होटल पनास में यूनिसेफ, चिल्ड्रन फिल्म सोसायटी आॅफ इंडिया,यंग इंडियन और सीआईआई बिहार चैप्टर और भरोसा की ओर से बाल अधिकार और सिनेमा की भूमिका विषय पर आयोजित कार्यशाला में बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि सिनेमा घरो में जब तक बच्चों को हाफ टिकट पर फिल्में नहीं दिखाई जाएंगी तब तक बच्चे सिनेमाघर नहीं जाएंगे। उन्होंने कहा कि ब्लैक एंड वाइट सिनेमा के दौर से हम रंगीन सिनेमा के दौर में गए पर बाल फिल्मों पर यह रंग अभी तक चढ़ा नहीं।
कार्यशाला में चरित्र अभिनेता गूफी पेंटल ने कहा कि फिल्में समाज का आईना होती है। मैरी कॉम जैसी मेनस्ट्रीम फिल्में बन रही है जो बच्चों को प्रोत्साहित करती हैं। बाल अधिकार के साथ