- Hindi News
- ‘आप’ की राजनीतिक शैली राजनीति पर उसका असर
‘आप’ की राजनीतिक शैली राजनीति पर उसका असर
यदि इस बार गद्दी मिलने पर भ्रष्टाचार समर्थक शक्तियां एक बार फिर केजरीवाल को गद्दी छोड़ने को विवश कर देंगीं, तो उसका राजनीतिक परिणाम देश भर में प्रकट हो सकता है। ‘आप’ देर सबेर राष्ट्रीय पार्टी बन कर उभर सकती है। याद रहे कि आप के 49 दिनों के शासनकाल में दिल्ली में भ्रष्टाचार काफी हद तक थम गया था।
भाजपा नेता डाॅ.सुब्रह्मण्यन स्वामी ने आम आदमी पार्टी के बारे में कुछ महत्वपूर्ण बातें कही हंै। अरविंद केजरीवाल की तुलना नक्सलियों से करते हुए उन्होंने भविष्यवाणी की है कि यदि ‘आप’ को दिल्ली प्रदेश की सत्ता मिली तो वह एक साल के भीतर सरकार से अलग हो जाएगी। स्वामी के अनुसार ‘केजरीवाल के सहयोगियों का संबंध नक्सलियों से रहा है। वे सरकार नहीं चला सकते। आप देखेंगे कि वे समाप्त हो जाएंगे।’ याद रहे कि केजरीवाल ने 49 दिनों के बाद ही मुख्यमंत्री पद से 15 फरवरी, 2014 को इस्तीफा दे दिया था। तब भी कुछ राजनीतिक पंडितों ने भविष्यवाणी की थी कि ‘आप’ अब समाप्त हो जाएगी। पर हुआ उसके विपरीत। एग्जिट पोल के नतीजों पर भरोसा करें तो ‘आप’ दिल्ली में एक बार फिर सरकार बनाएगी।
आखिर दिल्ली के अधिकतर लोग ‘आप’ को पसंद क्यों कर रहे है? क्यों भाजपा जैसी संगठित पार्टी और नरेंद्र मोदी जैसे लोकप्रिय नेता को भी दरकिनार कर अधिकतर जनता ‘आप’ को गले लगा रही है? जानकारों के अनुसार इसका कारण यह है कि ‘आप’ ने भ्रष्टाचार के प्रति शून्य सहनशीलता दिखाई है। यदि यही काम मोदी सरकार ने आठ महीनों में किया होता, तो ‘आप’ की चमक गायब हो गई होती।
पर सरकार के भीतर जाकर संभवतः मोदी जी और बाहर से डाॅ.स्वामी को लगता है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ चौतरफा युद्ध छेड़ देना किसी भी सरकार के लिए संभव नहीं है।
वहीं, ‘आप’ इस तर्क से सहमत नहीं दिखती। इस पृष्ठभूमि में डाॅ.स्वामी की यह सोच उनकी खुद की कसौटियों पर तो तार्किक लगती है। उन्हें लगता है कि नक्सली मानसिकता वाली ‘आप’ को यदि सरकार चलाने का मौका मिलेगा, तो उनकी सरकार भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई जीत ही नहीं सकेगी और, जब जीत नहीं सकेगी, तोे वे भाग खड़े होंगे। देश में अधिकतर जनता उस नेता या दल को अधिक पसंद करती है जो अपने सिद्धांतों के लिए गद्दी छोड़ने को तैयार रहता है। अरविंद ने जब पद छोड़ा था तो उस समय तो उनके समर्थकों के एक हिस्से ने उन पर गुस्सा दिखाया था। पर जब अरविंद ने स्थिति स्प्ष्ट की तो वही जनता संतुष्ट हो गई। इतना ही नहीं ‘आप’ का जन समर्थन बढ़ गया।
केजरीवाल जमात का उभार जन लोकपाल आंदोलन से हुआ था। उस समय ‘आप’ बनी भी नहीं थी। क्योंकि उसके नेताओं का उददेश्य राजनीति में जाना नहीं था। वे लोग अन्ना के नेतृत्व में गैर राजनीतिक आंदोलन चला कर जन लोकपाल विधेयक पास करवाना चाहते थे। पर जन लोक पाल विधेयक के मसविदे को देख मौजूदा राजनीतिक जमात, खासकर मनमोहन सरकार के कान खड़े हो गए थे। यदि उस विधेयक को उसी स्वरूप में पास कर दिया गया होता, तो देश के अनेक नेता जेल में होते और चालू राजनीति को अपना कायाकल्प कर देना पड़ता। पर इसके लिए आज भला कौन तैयार है ? इसीलिए अन्ना की सलाह से मनमोहन सरकार ने जिस स्वरूप में लोकपाल विधेयक बाद में पास किया, वह ‘आप’ के अनुसार नख-दंतविहीन है। जिस लोकपाल आंदोलन के कारण जनता ने 2013 में ‘आप’ को सत्ता दिलाई, यदि वही विधेयक पास नहीं कर पाई तो वह गद्दी पर क्यों बैठी रहती? वादा करके भूल जाने वाले दलों की भीड़ में ‘आप’ अलग तरह की पार्टी दिखाई पड़ रही है। यदि ‘आप’ को इस बार भी सत्ता मिलेगी, तो वह जन लोकपाल या यूं कहिए कि जन लोकायुक्त विधेयक को भूल नहीं सकती। पर विधेयक का जो मसविदा ‘आप’ के पास है, उसे विधेयक के रूप में पेश करने से पहले पूर्वानुमति की जरूरत पड़ेगी। ऐसे कड़े कानून बनाने की पूर्वानुमति यह व्यवस्था देगी ? उम्मीद तो नहीं है।
डाॅ.स्वामी को तो यह साफ लगता है कि वह अनुमति नहीं मिलेगी। फिर यदि बनी तो क्या ‘आप’ सरकार सिर्फ कुर्सी गर्म करने के लिए कुर्सी पर बनी रहेगी? स्वामी को लगता है कि ऐसा नहीं होगा, इसलिए तुनक कर आप सरकार फिर गद्दी छोड़ देगी। कई विश्लेषक मानते हैं कि देश भीषण सरकारी-गैर सरकारी भ्रष्टाचार से पीड़ित है। पहले डॉ लोहिया, फिर जेपी के नेतृत्व में चले आंदोलन का सबसे बड़ा मुद्दा भ्रष्टाचार था। बोफर्स घोटाले के खिलाफ वी.पी.सिंह के नेतृत्व में आंदोलन चला। पर इन आंदोलनों के बाद निजाम बदलने के बावजूद हालात नहीं बदले।
इनमें से किसी सरकार ने यह कह कर गद्दी नहीं छोड़ी थी कि वे आंदोलन के मुद्दे को सरकार में आकर लागू नहीं कर पा रहे हैं, इसलिए गद्दी छोड़ रहे हैं। यह काम सिर्फ ‘आप’ ने किया। यदि इस बार गद्दी मिलने पर देश की भ्रष्टाचार समर्थक शक्तियां एक बार केजरीवाल को गद्दी छोड़ने को विवश कर देंगीं, तो उसका राजनीतिक परिणाम देश भर में प्रकट हो सकता है। ‘आप’ देर सबेर राष्ट्रीय पार्टी बन कर उभर सकती है। याद रहे कि आप के 49 दिनों के शासनकाल में दिल्ली में भ्रष्टाचार काफी हद तक थम गया था। ऐसा प्रभाव अब तक मोदी सरकार नहीं दिखा पाई है। ‘आप’ की अगली सफलता या विफलता दोनों ही स्थितियों में देश भर में एक खास तरह के राजनीतिक ध्रुवीकरण की संभावना जाहिर की जा रही है। वह ध्रुवीकरण भ्रष्टाचार समर्थक और भ्रष्टाचार विरोधी शक्तियों के बीच हो सकता है। यदि ऐसा हुआ तो इसके साथ यह भी अपने आप हो जाएगा कि जाति, समुदाय और संप्रदाय के आधार पर समाज को बांट कर वोट बटोरने वाले नेताओं को उनकी नानी याद जाएगी।
(लेखक दैनिक भास्कर पटना के संपादकीय सलाहकार हैं)