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संविधान के विपरीत, कानून से परे..., परेशान हैं राजेंदर बाबू
राजेंदरबाबू (डॉ. राजेंद्र प्रसाद) परेशान हैं। दो दिन से “सत्ता ही सत्य है’ का नया रूप और “मूल्यों’ की राजनीति का लेटेस्ट अंदाज देख रहे हैं। वे भारतीय संविधान बनाने वाले संविधान सभा के अध्यक्ष थे। जिंदा होते, तो ऑफ दि रिकॉर्ड में ही सही, जरूर कहते कि ऐसे सिचुएशन की कल्पना भी होती, तो इसका भी ठोस और स्पष्ट इंतजाम किया जाता। दो दिन से उन्हीं (आदमकद प्रतिमा) के सामने सारा खेल चल रहा है। और इसके हर स्तर पर संविधान और कानून का हवाला दिया जा रहा है।
राजेंदर बाबू की परेशानी है कि वे एक पक्ष या स्थिति को संवैधानिक व्यवस्था में फिट कर किसी नतीजे पर पहुंचते भी नहीं हैं कि दूसरा तर्क इसे सीधे खारिज कर देता है। जो तर्क और इसकी काट में तर्क सामने हैं, वह “एक राज्य में एक ही समय में दो मुख्यमंत्री’ की स्थिति है।
संविधान के हिसाब से राजेंदर बाबू यह तो जान गए हैं कि अब सबकुछ राज्यपाल केसरी नाथ त्रिपाठी पर निर्भर है। लेकिन वे उनकी भी परेशानी समझ रहे हैं। वे दोनों पक्षों (मांझी कैम्प, नीतीश कैम्प) को देख रहे हैं। मगर बहुमत और मौका की परिणति पर बिल्कुल चुप हैं। कोई भी चुप हो जाएगा जी! दोनों कैम्पों का कौन सा तर्क कौन खारिज कर देगा?
आज राजेंदर बाबू थोड़ी देर तक नीतीश कुमार के इस तर्क का कानूनी पक्ष देखते रहे कि इस बार का बजट आखिर किस सरकार का होगा? राज्यपाल 20 फरवरी से शुरू बजट सत्र में किस सरकार का अभिभाषण पढ़ेंगे? जीतन राम मांझी को जदयू ने निकाल दिया है। फिर वे किस पार्टी की हैसियत से मुख्यमंत्री बने हैं? राजेंदर बाबू सोच-विचार कर किसी नतीजे तक पहुंचते कि जीतन राम मांझी की आवाज उनके कानों में पड़ी- “नीतीश तो असंवैधानिक नेता हैं। उनको उस विधानमंडल दल ने चुना है, जिसकी बैठक बुलाने का अधिकार मेरे पास है। और मैंने वह बैठक नहीं बुलाई थी।’ शरद यादव जोर-जोर से बोल रहे थे- “मुझको बैठक बुलाने का अधिकार है।’ तय करते रहिए।
राजेंदर बाबू, नए मुख्य सचेतक राजीव रंजन को सुन रहे थे- “मैंने ह्विप जारी कर दिया है। जो उल्लंघन करेगा, उसकी सदस्यता जाएगी।’ इसी दौरान श्रवण कुमार बोलने लगे- “मुख्य सचेतक तो मैं हूं। विधानसभा अध्यक्ष ने राजीव रंजन के बारे में अधिसूचना जारी की है?’ गजब।
देशर|, दोनों कैम्प के बहुमत के दावे को सुन रहे हैं। कौन काट देगा जी! कोई बोल रहा है, तो इसकी क्या गारंटी है कि गलत बोल रहा है? रमई राम ही कह रहे थे- “नरेंद्र सिंह, वृशिण पटेल, भीम सिंह, नीतीश जी के बड़का सलाहकार बनते थे। चल दिए मांझी के पास।’ सही में क्या गारंटी है कि दूसरे ऐसा नहीं करेंगे। दोनों कैम्प हाॅर्स ट्रेडिंग की बात कह भी रहे हैं।
राजेंदर बाबू ने यह खबर भी सुनी कि राज्यपाल ने विधानसभा अध्यक्ष से पूछा है कि आपने नीतीश कुमार को जदयू विधानमंडल दल के नेता के रूप में कैसे मान्यता दे दी? अभी तो विधायकों की संख्या बल को लेकर अस्पष्ट स्थिति है। गलत सवाल है? मुख्यमंत्री (मांझी) के रहते दूसरे विधायक दल नेता (नीतीश) का चयन के खिलाफ मामला पटना हाईकोर्ट में गया है। राजेंदर बाबू को भी फैसले का इंतजार है। इस बारे में खुद कुछ तय करने में असमर्थ रहे।
राजेंदर बाबू ने जदयू के उन चार विधायकों को भी राजभवन में घुसते देखा, जिनकी विधायकी पार्टी से बगावत के चलते चली गई है। पटना हाईकोर्ट ने इसे बहाल कर दिया है लेकिन विधानसभा सचिवालय से नोटिफिकेशन नहीं हुआ है। यह क्या है? बहुत बात है। बड़ी-बड़ी बात है। चलिए, संविधान ड्राफ्ट करने वाली कमेटी के चेयरमैन डॉ. भीम राम अंबेडकर थोड़ी दूर पर हैं। पटना हाईकोर्ट के बगल में। वरना उनको भी राजेंदर बाबू जैसी परेशानी से जूझना पड़ता।
{संविधान सभा के अध्यक्ष रहे डॉ. राजेंद्र प्रसाद के सामने खूब गढ़ा गया हर तर्क पर नया (कु)तर्क
{एक संवैधानिक व्यवस्था पर फिट होता है, तो दूसरा उसे खारिज कर देता है
{देख रहे लोकतंत्र की जन्मभूमि पर सत्ता ही सत्य है का नया रूप, ‘मूल्यों’ की राजनीति का अंदाज
{शुक्र है कि संविधान ड्राफ्ट करने वाले डॉ. भीमराव अंबेडकर थोड़ी दूरी पर हैं, वरना...
राजभवन मार्च के दौरान यूं सुस्ताए जदयू के नेता।