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घरेलू हिंसा रोकने के लिए सोच बदलें

7 वर्ष पहले
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कानून तो तमाम हैं, नए भी बनते रहेंगे, पर जब तक सोच में बदलाव नहीं आएगा तब तक देश में महिलाओं के खिलाफ हो रही हिंसा नहीं रुकेगी। खासकर घरेलू हिंसा के जो मामले हैं, उसमें आज पति-प|ी दोनों के स्तर पर सोच में बदलाव की जरूरत है। जीडीएम कॉलेज हरनौत और इंडियन साइकोलॉजिकल एसोसिएशन की तरफ से शनिवार को एएन सिन्हा इंस्टीट्यूट में आयोजित सेमिनार में चाणक्या विधि विवि के कुलपति प्रो. ए. लक्ष्मीनाथ ने ये बातें कहीं।

दो दिवसीय सेमिनार के उद्घाटन सत्र में प्रो. लक्ष्मीनाथ ने कहा कि सिर्फ कानून बनाने से घरेलू हिंसा को नहीं रोक सकते। पूर्व मंत्री भोला प्रसाद सिंह ने समाज में विवाहोपरांत हो रही यौन हिंसा का जिक्र करते हुए कहा कि पितृ सत्तात्मक समाज में यह कुप्रथा चली रही है। आज के परिवेश में भी महिलाएं प्रताड़ित हो रही हैं। ऐसे में कानून को और मजबूत करने की जरूरत है। वीर कुंवर सिंह विवि के कुलपति प्रो. अजहर हुसैन ने कहा कि सामजिक स्तर पर सोच में बदलाव की जरूरत है। इंडियन साइकोलॉजिकल एसोसिएशन के अध्यक्ष प्रो. तारणी ने कहा कि देश में विवाहोपरांत हो रही यौन हिंसा का मसला अब तक अछूता है, जबकि इस पर बड़े पैमाने पर चर्चा की जरूरत है। मौके पर जीडीएम कॉलेज के प्रिंसिपल एसएनपी सिन्हा, कॉलेज ऑफ कॉमर्स के प्रो. अशोक कुमार, डॉ. आईके रॉय, डॉ. कार्तिक झा, प्रो. परशुराम सिंह, प्रो. मीरा जायसवाल, डॉ. र|ा मुखर्जी ने भी विचार रखे।

एएन सिन्हा इंस्टीट्यूट में राष्ट्रीय सेमिनार