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रंगमंच मुंबई पहुंचने को नहीं, समाज में बदलाव के लिए...

7 वर्ष पहले
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जीहमें तो नाटक करना है। निर्देशक मृत्युंजय प्रभाकर का यह नाटक एक ऐसे गैर-पेशेवर नाट्य समूह के बारे में है, जिसका निर्देशक तो सामाजिक सोच के साथ रंगमंच करना चाहता है, लेकिन उसके अभिनेता मुम्बई की मायानगरी में अपने लिए ख्वाब बुनते दिखते हैं। गुरुवार को कालिदास रंगालय में नाट्य उत्सव के तहत इस नाटक का मंचन किया गया। नाटक के कलाकार कहते हैं कि रंगमंच इसलिए है, ताकि वह यहां अभिनय की बारीकियां सीखें और मुम्बई जाकर फिल्मी दुनिया में कैरियर बनाएं। निर्देशक कहता है- रंगमंच समाज में बदलाव के लिए है। पर, अभिनेता नहीं मानते हैं। निर्देशक उनकी हरकतों से परेशान होकर नाटक छोड़कर चला जाता है। आकांक्षा बंसल, प्रियांश शर्मा, शिशु चांदम, अभिरव सव्यसाची, पल्लवी, पूजा सिंह, उर्फी रूम अपने किरदार में बेहतर दिखे। संगीत संचालन अंकिता सिंह, वस्त्र विन्यास रिकिमी मधुकल्या का रहा।

रविंद्र भवन में गूंगी का मंचन

पटना|रविंद्रभवन सभागार में गुरुवार को रविंद्रनाथ टैगोर लिखित नाटक \\\"गूंगी\\\' का मंचन किया गया। इसके जरिए यह बताया गया कि आजादी के इतने वर्षों बाद भी देश में नारियों को उचित सम्मान नहीं मिल रहा है। पुरुष प्रधान समाज होने के कारण आज भी महिलाओं पर अत्याचार हो रहा है। रविंद्र परिषद द्वारा आयोजित 11 दिवसीय नाट्य महोत्सव के छठे दिन रंग मार्च के कलाकारों ने इस नाटक का मंचन किया। नाटक मृत्युंजय शर्मा द्वारा निर्देशित किया गया।

कालिदास रंगालय में हुए नाटक का एक दृश्य।