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संस्कृत को बोलचाल की भाषा बनाएं

7 वर्ष पहले
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संस्कृतभारतीय संस्कारों की भाषा है, जो लुप्त नहीं हो सकती। जीवन से मोक्ष तक का भारतीय रीति-रिवाज, विधि-विधान पूरा करने के लिए संस्कृत भाषा की जरूरत है। लेकिन, इसे आम बोल-चाल की भाषा बनाने के लिए लिए संघर्ष करना होगा। ये बातें राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान नई दिल्ली के परीक्षा नियंत्रक डॉ. जीआर मिश्रा ने कहीं। वे रविवार को बीआईए भवन में समग्र संस्कृत विकास समिति के वार्षिक समारोह में उपस्थित लोगों को संबोधित कर रहे थे।

कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. देवनारायण झा ने कहा कि जीवन का उद्देश्य केवल पैसा कमाना नहीं है। जीवन का उद्देश्य पैसा कमाने के साथ ज्ञान आत्म लाभ लेना भी है। इसके लिए संस्कृत का ज्ञान जरूरी है। यह केवल ब्राह्मणों की भाषा नहीं है। इस विषय का जो अध्ययन करेगा, संस्कृत उसी की भाषा हो जाएगी।

समारोह को राष्ट्रभाषा परिषद की पूर्व निदेशिका डॉ. मिथिलेश कुमारी मिश्रा, समग्र संस्कृत विकास समिति के संयोजक डॉ. मिथिलेश कुमार तिवारी, गुरुगोविंद सिंह कॉलेज के प्रो. अंजनी कुमार, राधाकांत तिवारी आदि ने भी संबोधित किया।