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बैठक की वैधता पर सवाल राज्यपाल को लिखा पत्र

6 वर्ष पहले
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बिहारमें जदयू में चल रहे सत्ता संग्राम के बीच कई राजनीतिक संवैधानिक प्रश्न उठने स्वभाविक हैं। जदयू विधानमंडल दल में नीतीश का बहुमत है तो मुख्यमंत्री पद पर रहते हुए जीतन राम मांझी को राजनैतिक मौका मिला है। इसी कारण दोनों के बीच शह-मात के खेल में शनिवार को कई चाल चले गए। एक ओर 243 सदस्यीय विधानसभा में राजद-कांग्रेस और भाकपा के समर्थन के कारण 130 सदस्यों के बूते नीतीश की सरकार बनाने का दावा ठोकने की तैयारी है। वहीं, कैबिनेट को विधानसभा भंग करने की सिफारिश का अधिकार प्राप्त कर मांझी ने सौदेबाजी करने का अवसर ले लिया है।

अपेक्षित संख्या में विधायकों के समर्थन का जुगाड़ हुआ तो विधानसभा में विश्वास मत प्राप्त करेंगे और नहीं जुगाड़ हुआ तो विधानसभा भंग करने की सिफारिश कर देंगे। इधर, विस चुनाव होने तक कार्यकारी मुख्यमंत्री बने रहने के साथ खुद के लिए चुनाव बाद सम्मानजनक पद और अपने समर्थकों को भाजपा का टिकट सुनिश्चित कराएंगे। विस चुनाव अक्टूबर-नवंबर में होना है। इसी कारण विधानसभा भंग करने की सिफारिश अभी राजभवन भेजने से मांझी ने रोक रखी है। नीतीश के सरकार बनाने का दावा ठोकने पर राज्यपाल द्वारा मुख्यमंत्री मांझी को 20 फरवरी से शुरू हो रहे विधानसभा के बजट सत्र के पहले ही दिन बहुमत साबित करने को कहा जा सकता है। मांझी को सत्ता में बने रहने के लिए कम से कम 30 विधायकों का खुद जुगाड़ करना होगा। तभी भाजपा के 87 सदस्यों का समर्थन सुलभ होगा। जीतन राम मांझी ने जदयू विधानमंडल दल की वैधता पर सवाल उठाकर शनिवार को राज्यपाल केशरी नाथ त्रिपाठी को पत्र लिखा और कहा कि उनके बगैर आयोजित बैठक सिर्फ अनधिकृत है बल्कि एजेंडा बगैर आहूत बैठक का निर्णय भी अमान्य है। शनिवार को विधानसभा एनेक्सी में अपराह्न चार बजे आयोजित बैठक के पहले मुख्यमंत्री ने राज्यपाल को लिखे पत्र में कहा कि इस तरह की बैठक बुलाने का अधिकार विधानमंडल दल के नेता के नाते उनका होता है।

तबराज्यपाल क्या करेंगे?

राजभवननीतीश से पूछ सकता है कि जीतन राम मांझी को नेता पद से बगैर हटाए या अविश्वास प्रस्ताव स्वीकृत किए बगैर नए नेता का चुनाव कैसे हो सकता है? मांझी को तो पार्टी से निकाला है। ऐसे में वह विधानमंडल दल के नेता के रूप में ही मुख्यमंत्री हैं। जदयू अध्यक्ष वशिष्ठ नारायण सिंह की अध्यक्षता में आयोजित बैठक में नीतीश कुमार को सर्वसम्मति से नेता चुन जाने का प्रस्ताव स्वीकृत हुआ है।

किसमुद्दे पर सुलह नहीं हो पाई?

ललनसिंह और पीके शाही को लेकर सुलह वार्ता विफल हो गई। इन दोनों को दोबारा मंत्री बनाने पर मांझी सहमत नहीं थे। वहीं इन दोनों ने फिर जीतन राम मांझी के साथ काम करने से साफ तौर से सिर्फ मना कर दिया था। मांझी की ओर से सुलह के लिए 20 फरवरी को होने वाली बैठक स्थगित करने की बात कही गई थी।

15मंत्रियों को क्यों किया बर्खास्त?

15मंत्रियों की बर्खास्तगी का आधार कैबिनेट की विशेष बैठक में विस भंग करने की सिफारिश के मसले पर हुए विमर्श का मीडिया के सामने खुलासे को बनाया। उनका कहना था कि पद और गोपनीयता की शपथ का संबंधित मंत्रियों ने उल्लंघन किया है।