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7 वर्ष पहले
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सुनवाई में देरी का रिकाॅर्ड

ललित नारायण मिश्र हत्याकांड से संबंधित मुकदमे की सुनवाई पूरी होने में बेहद देरी हुई। इस देरी ने देश की अदालतों में त्वरित सुनवाई की और अधिक जरूरत बता दी है। 1975 में तत्कालीन रेलमंत्री एलएन मिश्र की बिहार में हत्या कर दी गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने 1979 में ही इस केस की त्वरित सुनवाई का आदेश दिया था। इसके बावजूद इतनी देर हुई। दिल्ली की एक अदालत ने इस मामले की सुनवाई के बाद निर्णय सुरक्षित रख लिया है। फैसला 10 नवंबर को आएगा। अभी तो यह फैसला निचली अदालत का होगा। बाद में यह मामला हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में भी जा सकता है। यानी, इस केस के तार्किक परिणति तक पहुंचने में कुछ दशक और भी लग सकते हैं। वीवीआईपी से जुड़े इस मामले को देखने के बाद यह लगता है कि सुप्रीम कोर्ट के निदेश के बावजूद इस देश में त्वरित सुनवाई नहीं हो पा रही है। इस काम में बाधाएं बहुत हैं, इसलिए यदि त्वरित सुनवाई सचमुच करानी है तो इस संबंध में संसद को कुछ कड़े कानून बनाने पड़ेंगे।

एलपीशाही की जीवनी

पूर्वकेंद्रीय राज्यमंत्री एलपी शाही की बहुप्रतीक्षित जीवनी छपकर गई है। 94 साल के शाहीजी की यह किताब समकालीन राजनीतिक इतिहास की भीतरी जानकारी देती है। करीब ढाई सौ पन्नों की किताब में कई जानी-अनजानी बातें हैं। जीवन की संध्या बेला में भी शाहीजी ने राजनीति के बीच के कई भ्रष्ट, बेईमान, अपराधी, विवादास्पद और चर्चित लोगों के बारे में इतनी निर्भीकतापूर्वक बातें लिखी हैं कि उन बातों पर कुछ विवाद भी उठ सकते हैं। वैसे कई बातें छूट भी गई हैं। कुछ बातें कुछ लोगों को एकतरफा भी लग सकती हैं। पर, कुल मिलाकर किताब पढ़ने लायक है। किताब का नाम है- ‘बनते बिहार का साक्षी।’ हालांकि, इसका नाम होना चाहिए था - ‘बनते-बिगड़ते बिहार का साक्षी।’

संस्मरणोंका महत्व

शाहीजीकी ही तरह राज्य के कुछ नए-पुराने नेतागण ऐसी किताबें क्यों नहीं लिखते? बिहार से बहुत कम ही नेताओं ने अपने संस्मरण लिखे हैं। उन नेताओं को भी इस तरह की किताबें लिखनी ही चाहिए, जिनके पास अपने कर्मों और संस्मरणों के खजाने हैं। उन किताबों से लोगों को यह पता चलेगा कि इस देश और राज्य को बनाने और बिगाड़ने में किनका कितना योगदान रहा है। यदि विभिन्न दलों, गुटों, समुदायों और विचारधाराओं के नेतागण अपने-अपने संस्मरण लिखें, तो कुल मिलाकर सारी बातें सामने जाए