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सिस्टम के चक्कर में फंसे राज्य के पीएचडीधारी छात्र
राज्यके विश्वविद्यालयों में शिक्षकों की नियुक्ति की प्रक्रिया शुरू हो गई है। कुल 3447 शिक्षकों की बहाली होनी है। नियुक्ति के लिए योग्यता तय हो चुकी हैं, लेकिन बवाल योग्यता निर्धारण पर शुरू हुआ है। नियुक्ति के लिए न्यूनतम योग्यता स्नातकोत्तर में 55 फीसदी अंक और नेट उत्तीर्ण रखा गया है। यूजीसी 2009 के रेगुलेशन के आधार पर जो पीएचडी/एमफिल किए हों, उनके लिए नेट उत्तीर्ण होने की अनिवार्यता नहीं रहेगी। विवाद की जड़ भी यही है कि राज्य के किसी भी विश्वविद्यालय से 2009 के रेगुलेशन के आधार पर पीएचडी करने वाला कोई नहीं है।
यह व्यवस्था 2013 में लागू हुई। पीएचडी का पाठ्यक्रम कम से कम दो वर्षों का होता है। इस तरह नए रेगुलेशन पर पीएचडीधारी अभी नहीं हैं। इसको लेकर विश्वविद्यालय प्रशासन से लेकर राजभवन तक खींचतान चलती रही। लेकिन, इस खींचतान में बिहार के सभी पीएचडीधारी फंस गए हैं। उनकी पीएचडी की डिग्री पूरी होने के बाद भी नियुक्ति में इसका कोई फायदा नहीं मिलेगा।
यूजीसी का पीएचडी का नया रेगुलेशन 2009 में जारी हुआ लेकिन बिहार के विश्वविद्यालयों में यह लागू हुआ 2013 में। जबकि, यूपी, राजस्थान समेत कई प्रदेशों में इसे पहले ही लागू किया जा चुका है। ऐसे में कॉलेजों में शिक्षकों की नियुक्ति में दूसरे प्रदेश के अभ्यर्थियों को छूट मिलने की आशंका से बिहार के अभ्यर्थी नाराज हैं। उनका कहना है कि सिस्टम सही काम नहीं किया तो चार वर्ष की देरी हुई, इसका खामियाजा वो क्यों भुगतें।
पीएचडी पर नियुक्ति में सीधे अंक का प्रावधान नहीं किया गया है। लेकिन नए रेगुलेशन पर पीएचडी करने वालों को नेट से छूट देने का प्रावधान है। इस मामले में अभ्यर्थियों का कहना है कि नियुक्ति 2003 के बाद से अब तक नहीं हुई, जबकि नया रेगुलेशन 2013 में लागू हुआ। इसलिए इस बीच पीएचडी करने वाले सभी अभ्यर्थियों को नेट में छूट का लाभ दिया जाए।
रेगुलेशन लागू करने में लगे चारसाल
यूजीसीने 2009 में पीएचडी के लिए नया रेगुलेशन बनाया। सभी विश्वविद्यालयों के लिए यह अनिवार्य हो गया है कि वे अपने विद्यार्थियों को इसी पैटर्न पर पीएचडी करने दें। इसके लिए यूजीसी ने सभी विश्वविद्यालयों को 2012 तक का वक्त दिया। शुरुआत बिहार में भी हुई जिसमें पटना विश्वविद्यालय में तत्कालीन प्रतिकुलपति प्रो. एसआई अहसन की अध्यक्षता में एक कमेटी बनी। यह कमेटी 2010