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महासचिव बनना मकसद नहीं, कमजाेर वर्ग की आवाज बनूंगी
कमजोरवर्ग की आवाज उठाना और उनके जीवन में बदलाव लाना ही मेरा मकसद है। जेएनयू का महासचिव पद तो महज पड़ाव है। यहां से आगे की राह बनाने का प्रयास करूंगी। ये बातें भोजपुर जिले के कोलोडेहरी की चिंटू कुमारी ने कहीं।
उन्होंने कहा कि मेरी पहली प्राथमिकता गरीबों समाज के अंतिम व्यक्ति की आवाज बनने की होगी। देश के सर्वाधिक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में से एक जेएनयू में महासचिव चुने जाने से पहले वह काउंसलर भी रह चुकी हैं। महादलित परिवार से संबंध रखने वाली चिंटू की प्रारंभिक पढ़ाई कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय में हुई। इंद्रप्रस्थ महिला कॉलेज से स्नातक करने के बाद जेएनयू में प्रवेश पाने वाली चिंटू ने कहा कि यह बदलाव की शुरुआत है। आगे रास्ता आसान नहीं है। लेकिन, अब तक के सफर से जो सीख मिली है, वह आगे की राह को आसान बनाने में मदद करेगी।
पूर्व केंद्रीय मंत्री बांका के पूर्व सांसद दिग्विजय सिंह के राजनीतिक कॅरियर की शुरुआत जेएनयू से ही हुई थी। तब जेएनयू में बिहार से जाने वालों की संख्या आज के मुकाबले कम होती थी। लेकिन, बदलते वक्त और नियमों के कारण जेएनयू में बिहारियों के प्रवेश में वृद्धि हुई और नेतृत्व भी बिहारी छात्र करने लगे।
सीवान के चंद्रशेखर चुनिंदा छात्र नेताओं में हैं, जिन्हें आज भी याद किया जाता है। वह जेएनयूएसयू में उपाध्यक्ष और फिर दो बार अध्यक्ष रहे। तब लिंगदोह कमेटी का बंधन नहीं था। उपाध्यक्ष रहते हुए उन्होंने 1993 में जेएनयू में डीप्राइवेशन प्वाइंट सिस्टम की पुन: शुरुआत कराई। इसे 1983 में बंद कर दिया गया था। इस सिस्टम के आने के बाद वैसे क्षेत्रों के छात्रों को दो हिस्सों में बांटा गया, जहां शिक्षा की व्यवस्था उच्च नहीं है। इसमें एक कैटेगरी में विद्यार्थियों को 5 अंक दिए जाते थे, जबकि दूसरे में 3 अंक। बिहार के अधिकतर जिले इसी में आते हैं। इस नियम के लागू होने के बाद बिहारियों के नामांकन का अनुपात बढ़ा।
कृत्रिम लहर की हवा निकली : आशुतोष
एएनएस कॉलेज, बाढ़ से इंटर पास करने वाले आशुतोष का जेएनयूएसयू अध्यक्ष बनने तक का सफर बीएचयू से आगे बढ़ा है। राजनीति विज्ञान के छात्र आशुतोष जेएनयू से रशियन स्टडीज में एमफिल कर चुके हैं और पीएचडी कर रहे हैं। अब आशुतोष जेएनयूएसयू के अध्यक्ष बने हैं। उन्होंने कहा कि जेएनयू में आइसा की जीत कई मायनों में बदलाव का संकेत है। जेएनयू और दि