इस हफ्ते
मधुरेश
ये नेता, ये ज्ञानी
अब मैंने भी मान लिया है कि वाकई, लोकतंत्र इसी महान बिहार की धरती पर पैदा हुआ होगा। बाप रे, गजब का लोकतांत्रिकरण है। पोर-पोर में लोकतंत्र है। बोलने में लोकतंत्र। कर देने में लोकतंत्र। ज्ञानियों की इस भूमि पर ज्ञान का भी लोकतांत्रिकरण लाजवाब अंदाज में है। सबका अपना-अपना ज्ञान है। ज्ञान को व्यक्त करने की परम स्वतंत्रता है।
मैं कई दिन से बेजोड़ ज्ञान के बहाने ज्ञानियों को टकराते हुए देख रहा हूं। आजकल जैसे ही और जहां भी दो-तीन लोग जुटते हैं, सरकार बनने-गिरने लगती है। इस काम में वे भी शामिल हैं, जो चुनाव के दिन अपना वोट भी शायद देते होंगे। लेकिन सरकार बना-गिरा रहे हैं। जिन्होंने भारतीय संविधान को नहीं पढ़ा है, वे संविधान की धुआंधार व्याख्या कर रहे हैं। गजब।
मैं समझता हूं कि इसमें किसी की कोई गलती नहीं है। संविधान ने सबको मौका दिया हुआ है। सभी इसका इस्तेमाल कर रहे हैं। इसे बांच रहे हैं। असल में संविधान के बनते वक्त यह कल्पना नहीं की गई होगी कि राजनीति का सूत्रवाक्य कभी ‘सत्ता ही सत्य है, बाकी सब झूठ’ बनेगा, यह सब बाकायदा “मूल्यों’ की राजनीति तक विस्तारित होगा। और अभी तो सरकार-सरकार के खेल में कई पक्ष हैं। सभी अधिकार संपन्न हैं। राज्यपाल, विधानसभा अध्यक्ष, मुख्यमंत्री, विधायक दल, विधानमंडल दल, मुख्य सचेतक, पार्टी …, पटना हाईकोर्ट भी इसका हिस्सेदार बना दिया गया है।
मैं यह भी देख रहा हूं कि दोनों कैम्प (मांझी-नीतीश) एक-दूसरे के तर्क को सिरे से खारिज कर दे रहे हैं। बेशक, ये दोनों दूसरे को नकार रहे हैं। कौन निरपेक्ष भाव से यह बताने की स्थिति में है कि उनके तर्क नकारने लायक हैं? दोनों के तर्क स्थापित व्यवस्थाओं के हवाले ही तो हैं। देखिए, सबकुछ बहुमत और मौका के परस्पर विरोधी स्थिति में फंसा है। इसकी बड़ी लम्बी व्याख्या है। ज्यादा की चर्चा इसलिए नहीं कि आप तो खुद ज्ञानी हैं। आप से कौन जीत सकता है जी!
मेरी राय में जो हालात हैं, बस मारपीट ही बची है। यह भी हो जाए तो आश्चर्य नहीं। इसका ट्रेलर तो आज विधानसभा में दिखा भी, जब रवींद्र राय को मार्शल ने बाहर किया। कोई और उपाय था क्या?
चलिए, मांझी कैम्प के राजीव रंजन ने नया ज्ञान कराया है। उनकी माने तो नेता (खासकर विधायक) जासूस भी होता है। उन्होंने कहा है-दिल्ली गए विधायकों में से सोलह विधायक हमारे जासूस हैं। आगे राजीव रंजन यह बता सकते हैं कि उनके जासूसों ने क्या-क्या किया है? जो दौर है, उनकी रूटीन रिपोर्टिंग फ्लैश हो सकती है। नीतीश कैम्प भी खूब फ्लैश कर रहा है। चाहे जो कुछ हो, विधायकों के मामले में यह बात और मजबूती से स्थापित हुई है कि वे मौके के हिसाब से अपने लिए अच्छी कीमत तय कराने में कामयाब रहते हैं।
एक प्रबुद्ध बैठकी में कुछ लोग इस गंभीर मजाक में उलझे थे-’क्या हमलोग बहुत तेजी से एक नए संविधान या उसकी कुछ व्यवस्थाओं के साफ-साफ इंतजाम की तरफ बढ़ रहे हैं?’ ये ज्ञानी तब भी अपने ज्ञान बांटने की गुंजाइश बना लेंगे। इस दिमाग पर कोई भी फिदा हो जाएगा जी! madhuresh.89@dbcorp.in