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टकरा रहा सिस्टम

7 वर्ष पहले
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कुलदीपनारायण प्रकरण में सिस्टम टकरा तो रहा है, मगर अदब के साथ। सबसे दिलचस्प यह है कि इसका हर पक्ष, उनकी बातें, उनके तर्क, उनकी विवशता सही है। वस्तुत: यही सिस्टम है। यह उसके खेल का बस एक रंग है, जो संपूर्णता में आम शहरी को प्रताड़ित करता रहता है।

सरकार ने कुलदीप नारायण के दोष गिना अपना काम कर दिया। उनको निलंबित कर दिया। लेकिन यह भी दिखाया, जताया है कि उसे हाईकोर्ट के आदेश का पूरा ख्याल है। सरकार यह सबकुछ कोर्ट को बताएगी और उसकी अनुमति से निगम आयुक्त के पद पर किसी दूसरे पदाधिकारी की तैनाती करेगी। कोर्ट ने कुलदीप को नहीं हटाने का आदेश दे रखा है। देखने वाली बात होगी कि अब कोर्ट क्या करता है?

सरकार ने जो दोष गिनाएं हैं, गलत हैं? आम शहरी को बुनियादी नागरिक सुविधाएं चाहिए। इसके मिलने में कोई तर्क कबूल किया जा सकता है? लेकिन यह सवाल तो उभरता है कि क्या इन स्थितियों के लिए कुलदीप अकेले जिम्मेदार हैं? यह भी तो पूछा जा सकता है कि नगर विकास के उस प्रस्ताव का क्या हुआ, जिसमें संपूर्ण पटना नगर निगम को भंग करने की अनुशंसा थी? कुलदीप का हटना या रह जाना भी क्या सबकुछ ठीक होने की गारंटी है? आखिर नागरिक सुविधाओं की उपलब्धता के मोर्चे पर जनता की त्राहिमाम-सी स्थिति कब तक इस तर्क पर जिंदा रहेगी कि पटना नगर निगम को चलाने वाले अभी आपस में फरिया रहे हैं, जिसको शांत कराने के बारे में हाईकोर्ट भी कह चुका है कि \\\'हम अपना समय बर्बाद नहीं करेंगे।\\\'

बिहार में ऐसा खूब हुआ है। सिस्टम से जुड़े विभिन्न तंत्र सीधे टकरा जाते थे। साधु यादव ने ट्रांसपोर्ट कमिश्नर रहे एनके सिन्हा के चैम्बर में घुसकर उनके साथ बदसलूकी की। बिहार लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष, जो इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षा घोटाला के आरोपी माने गए थे, को लेकर कई संवैधानिक संस्थाएं बहुत दिन तक टकराव की मुद्रा में रहीं। तब भी बड़ा बवाल मचा था, जब विधानपरिषद में न्यायिक सक्रियता के मुद्दे पर बाकायदा बहस हो गई थी। राजभवन के साथ सरकार का टकराव। चाहे सीके अनिल हों या राजद सांसद रहे मो. शहाबुद्दीन के चलते लोकसेवकों का सामने आया तनाव, फजीहत अंतत: सिस्टम की हुई। यह तब का दौर था, जब हाईकोर्ट \\\'जंगल राज\\\' जैसी टिप्पणी करता था, और इसका जवाब भी आता था- \\\"जंगल का राजा शेर होता है।\\\' ऐसे ढेर सारे नमूने हैं, जो बिहार को बस बदनामी देते रहे हैं।

बहरहाल, सुशासन