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नाटक रजनी में दिखी स्त्री उत्पीड़न की दास्तां

7 वर्ष पहले
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जन्मलेतेही उस बदनसीब के मां-बाप गुजर गए, इसका कारण दादी उसे ही मानती और दिन रात कोसती। कहने को एक भाई भी था लेकिन वह भी मानसिक रूप से कमजोर। गरीबी के कारण घर गिरवी रखा रहता है जिसका फायदा उठाकर महाजन कर्ज मिलने पर उस बेचारी की शादी जबरन अपने बूढ़े बाप से करा देता है। उस बदनसीब स्त्री का नाम था रजनी जिसने कदम-कदम पर इस पुरुष सत्तात्मक समाज में उत्पीड़न झेला।

यह कहानी दिखी प्रेमचंद रंगशाला परिसर में शुक्रवार को नुक्कड़ नाटक् रजनी की दास्तां में। इसकी प्रस्तुति हुई भिखारी ठाकुर की 127 वीं जयंती के उपलक्ष्य में डिवाईन सोशल डेवलपमेंट आर्गेनाइजेशन के बैनर तले आयोजित युवा नाट्य निर्देशकों पर केन्द्रित समारोह नटलीला 2014 के दौरान हुआ। नवरस कला केन्द्र, पूर्णिया की ओर से प्रस्तुत और मुकेश कुमार राहुल निर्देशित इस नाटक में समाज में होने वाली स्त्री उत्पीड़न की घटनाओं को दिखाया गया। वहीं दूसरे नाटक जतरा खराब में भ्रष्ट व्यवस्था काे दिखाया गया।