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“गर्व होताहै कि मैंने उनसे सर्जरी सीखी। उनका सानी नहीं।”

6 वर्ष पहले
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ढ़ाई के दौरान नरेंद्र बाबू का खूब नाम सुना था। उनके अंडर काम करने का मौका एक सपने के सच होने जैसा था। गृह जिला एक होने की वजह से युवा अवस्था से ही उन्हें जानता था, लेकिन साल 1981 के आसपास उनसे मिलने का मौका मिला। मिलने पर मन में सवाल उठा कि इतनी ख्याति वाला कोई व्यक्ति इतना साधारण कैसे हो सकता है? शुरुआत में उनके अजीज रहे डाॅ. एन. के. सिन्हा के घर पर उनसे मुलाकात होती थी। फिर उनके साथ काम का मौका मिला। सर्जरी में उनका कोई सानी नहीं है, ऐसे में मुझे गर्व होता है कि मैंने उनसे सर्जरी सीखी है। हार्नियोग्राफी और किडनी से पथरी निकालने की कला खासतौर पर उन्हीं से सीखी। उस दौर में उससे ज्यादा जो सीखा, वह थी मरीजों से आत्मीयता। मरीज और अपने बीच कभी भी रुपए को नहीं आने देना, डाॅ. नरेंद्र प्रसाद की बड़ी खूबी थी। गरीबों के लिए हमेशा तत्पर देखता हूं उन्हें। उनसे मिली इस सीख को आज भी निभाने की कोशिश करता हूं। जितना मौका मिलता है, उनकी मदद करने की कोशिश जरूर करता हूं। पद्मश्री मिलने के बाद अगली सुबह जब मैंने उन्हें फोन कर बधाई दी, तो जवाब मिला- आप लोगों ने बॉयोडाटा पर दस्तखत कराया था, तब मुझे विश्वास नहीं हो रहा था। यह सब आप सब लोगों की वजह से हुआ है।

सर्जन तो उनसे पहले भी हुए और आगे भी होते रहेंगे, लेकिन नरेन्द्र बाबू जैसा व्यक्तित्व कहां से लाएंगे। उनके व्यक्तित्व का अनुमान एक घटना से लगा सकते हैं। हुआ यूं कि आईएमए में भेजने के लिए उन्हें खड़ा किया गया। उस दौरान करीब 16 अन्य उम्मीदवार भी थे। जैसे-जैसे डॉक्टरों को पता चलता गया कि नरेन्द्र बाबू उम्मीदवार हैं, सब वापस होते चले गए। एम्स के पुराने सर्जन नरेंद्र बाबू के किए ऑपरेशन पर कभी कमेंट तक नहीं करते थे। इस नाम से परिचित देश का कोई सर्जन ऐसा ही करता है। नरेंद्र बाबू को पद और पैसे की कभी लालसा नहीं रही। उनकी एक बात हमेशा जेहन में रहती है, जब वह सिर हिलाकर मधुर आवाज में कहते हैं कि सहजा बाबू भगवान ने सब कुछ तो दे दिया है, जितना सोचा था उससे भी ज्यादा। सोचिए! एक ऐसा व्यक्ति जिसे इस क्षेत्र का सर्वाधिक प्रतिष्ठित बीसी राय अवार्ड और सेवाओं के लिए पद्म श्री सम्मान मिल चुका हो, लेकिन नाम मात्र का घमंड हो। पटना मेडिकल कॉलेज में जब वह शिक्षक थे, तब सबसे ज्यादा अनुशासन सर्जरी विभाग में ही था। वह खुद ही सुबह नौ बजे पहुंच जाते थे, शाम का राउंड जरूर करते थे। किसी छात्र की गलती पर वहीं उसे टोक देते थे। आज भी वह अनुभव बेमिसाल है। डॉक्टरों की गिरती साख पर अक्सर चिंता करते हैं, कहते हैं कि भगवान के बाद जीवन देने का सौभाग्य इस पृथ्वी पर केवल डॉक्टरों को ही मिलता है। ऐसे में भगवान नहीं, तो डॉक्टरी के कर्तव्यों को जरूर निभाना चाहिए। मैंने उनसे एक और खास बात सीखी- डॉक्टरों की असल रॉयल्टी उनका मरीज होता है।

उन्हें किसी प्रचार आदि की जरूरत नहीं पड़ती थी। ठीक होने वाले मरीज ही प्रचार करते थे। यही वजह है कि मैंने उन्हें कभी किसी पोस्टिंग और पुरस्कारों के लिए चक्कर लगाते हुए नहीं देखा था। पैरवी कर दिखाने की कोशिश करने वालों को मैंने कई बार उन्हें इनकार करते देखा है। वह कहते हैं कि सहजा जी आखिर सभी मरीजों को डॉक्टर की उतनी ही जरूरत है, तो फिर किसी को पहले या फिर बाद में क्यों देखा जाय। उनके जीवन की सबसे बड़ी खासियत है कि वह संघर्षों से इतनी ऊचाई पर पहुंचे हुए व्यक्ति हैं। ऐसे में वह हमेशा जमीन से जुड़े हैं। अपने से जुड़े लोगों काे हमेशा ऐसा करने की ही सीख देते भी हैं। नरेन्द्र बाबू डॉक्टरी के असली विभूषण हैं।

(बातचीत:देवेंद्र तिवारी)

प्रख्यात सर्जन डॉ. नरेंद्र प्रसाद को पद्मश्री मिलने पर उनसे सर्जरी सीखने वाले आईएमए के एक्टिंग प्रेसिडेंट डाॅ. सहजानंद प्रसाद सिंह ने कहा-

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