एचआईवी फोबिया के खिलाफ चलाई मुहिम
क्लिंटन सिनॉसी कर चुके हैं सम्मानित
इसकाम के लिए डॉ. तेजस्वी को कई पुरस्कार-सम्मान मिल चुके हैं। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन के साथ ही एचआईवी की खोज करने वाले नोबल प्राइज विजेता डॉ. फ्रंक्वैंस बर्र-सिनॉसी भी इन्हें सम्मानित कर चुके हैं। यूएनओ के रेड रिबन अवार्ड के लिए लगातार तीन साल तक चयनकर्ता रहे। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एड्स रोग पर हुए शोध पत्रों के लगातार समीक्षक रहे। अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य संगठन, यूएसए के चिकित्सा निदेशक के रूप में भारतीय चिकित्सकों और पड़ोसी देशों से आए चिकित्सकों को भी एड्स रोकथाम का प्रशिक्षण दिया।
नवीन चंद्र
ने,गले लगाने या साथ खाने से एचआईवी का संक्रमण नहीं फैलता, एड्स नहीं होता। ऐसी बातें खूब होती हैं, लेकिन पटना के डॉ. दिवाकर तेजस्वी ने इसे प्रायोगिक रूप से दिखाने का जिम्मा उठाया। किसी के कहने पर नहीं। यूएनओ के एक कार्यक्रम में इथोपिया की हालत देखकर बिहार में जागरुकता की अलख जगानी शुरू की थी डॉ. तेजस्वी ने। प्रदेश में व्यक्तिगत स्तर पर ऐसा कार्यक्रम चलाने वाले डॉ. तेजस्वी अकेले हैं।
इस डॉक्टर ने एचआईवी संक्रमित और एड्स पीड़ित मरीजों के प्रति ऐसा व्यवहार किया और करना सिखाया, जिससे उनकी जिंदगी की दुश्वारियां घटे। अमूमन ऐसा देखा जाता रहा है कि जैसे ही किसी के एचआईवी संक्रमित होने का पता चलता है, घर-परिवार और दोस्त-डॉक्टर भी उससे दूरी बना लेते हैं। दर्जनों ऐसे उदाहरण सामने आते रहे हैं, जहां परिवार वालों ने खुद को संक्रमित होने से बचाने की सोच रखते हुए ऐसे व्यक्ति को घर से बेघर कर दिया। जानकारी फैली तो गांव तक से निकाल दिया गया। ऐसे ही लोगों को दिल से लगाया और उसकी सेवा जुटे हैं डॉ. तेजस्वी।
डॉक्टरमाता-पिता सेजुदा राह
आमतौरपर देखा गया है कि अगर किसी डॉक्टर कपल का बेटा डॉक्टर बनता है तो वह उसी विभाग या उससे जुड़े किसी स्ट्रीम को अपनाता है, लेकिन डॉ. तेजस्वी ने अपनी राह खुद बनाई। पिता डॉ. केके शरण ईएनटी सर्जन हैं और माता डॉ. किरण शरण शिशु रोग विशेषज्ञ हैं। डॉ दिवाकर तेजस्वी ने इन दोनों विभागों या इससे जुड़े विभाग को नहीं चुना। फिजिशियन के रूप में प्रैक्टिस करते हुए एचआईवी संक्रमित और एड्स पीड़ितों के लिए काम करना शुरू कर दिया।
इथोपियायात्रा ने बदलडाली सोच
नालंदामेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस की डिग्री लेने वाले डॉ. दिवाकर तेजस्वी बताते हैं- यूएनओ के प्रोजेक्ट पर इथोपिया में था। वहां एड्स से उत्पन्न स्थिति को देख कर दंग रह गया। इसके कारण कई घरों में ताले जड़ गए थे। कई बच्चे अनाथ हो गए थे। वहां की स्थिति को देख कर ही मुझे इस रोग के प्रति जागरुकता फैलाने और इस ओर काम करने की प्रेरणा मिली। यूनाइटेड नेशंस डेवलपमेंट प्रोग्राम के तहत इथोपिया की अल्माया यूनिवर्सिटी के हेल्थ साइंसेज विभागाध्यक्ष के रूप में 1998 से 2002 तक काम किया। बिहार वापस आया तो समाज को जागरूक करने के लिए एक एड्स पीड़ित और एक मृतक की विधवा के साथ बातचीत की। उनका जूठा खाना खाया और लोगों को बताया कि उनसे परहेज करें। ये भी समाज के ही लोग हैं।
डॉ दिवाकर तेजस्वी इसके बाद इस रोग के बहुतेरे मरीजों को गले से लगाया। जिसे भी जरूरत पड़ी, हर तरह से मदद की। इसके पीड़ित रोगी को अपना खून दिया। उनके साथ केक काटकर और खाकर अपना जन्मदिन मनाया। समाज में इसके प्रति जागरुकता फैलाने के लिए राज्य के कई जगहों पर सेमिनार आयोजित कर उन्हें बताया कि हमें इसके बचाव के लिए क्या करना चाहिए। समाज को इसके पीड़ित रोगियों को दरकिनार करने की सलाह दी। इसके प्रति काम करने वाले डॉक्टरों अन्य लोगों को उन्होंने आगे बढ़ाया।
समाजसेवा केलिए पहल
एड्ससे जान गंवाने वाले एक व्यक्ति की मौत पर उसके चार बच्चों की डॉ. तेजस्वी ने परवरिश की। पांच बच्चों की पढ़ाई के लिए स्कॉलरशिप प्रदान कर रहे हैं। बिहार में एड्स के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिए नि:शुल्क एड्स जांच तथा जागरूकता कार्यक्रम के अंतर्गत हजारों को लाभान्वित कर चुके हैं। पब्लिक अवेयरनेस फॉर हेल्थफुल एप्रोच फॉर लिविंग (पहल) संस्था के जरिए लोगों को स्वास्थ्य के प्रति जागरूक कर रहे हैं। संस्था के माध्यम से सेमिनार, स्वास्थ्य शिविर आयोजित कर लोगों को बताते हैं कि कैसे आप अपने शरीर के प्रति जागरूक हों।
RARE work... डॉ.दिवाकर तेजस्वी | एचआईवी संक्रमित एड्स पीड़ितों को समाज की मुख्यधारा में ला रहे
नवीन चंद्र
ने,गले लगाने या साथ खाने से एचआईवी का संक्रमण नहीं फैलता, एड्स नहीं होता। ऐसी बातें खूब होती हैं, लेकिन पटना के डॉ. दिवाकर तेजस्वी ने इसे प्रायोगिक रूप से दिखाने का जिम्मा उठाया। किसी के कहने पर नहीं। यूएनओ के एक कार्यक्रम में इथोपिया की हालत देखकर बिहार में जागरुकता की अलख जगानी शुरू की थी डॉ. तेजस्वी ने। प्रदेश में व्यक्तिगत स्तर पर ऐसा कार्यक्रम चलाने वाले डॉ. तेजस्वी अकेले हैं।
इस डॉक्टर ने एचआईवी संक्रमित और एड्स पीड़ित मरीजों के प्रति ऐसा व्यवहार किया और करना सिखाया, जिससे उनकी जिंदगी की दुश्वारियां घटे। अमूमन ऐसा देखा जाता रहा है कि जैसे ही किसी के एचआईवी संक्रमित होने का पता चलता है, घर-परिवार और दोस्त-डॉक्टर भी उससे दूरी बना लेते हैं। दर्जनों ऐसे उदाहरण सामने आते रहे हैं, जहां परिवार वालों ने खुद को संक्रमित होने से बचाने की सोच रखते हुए ऐसे व्यक्ति को घर से बेघर कर दिया। जानकारी फैली तो गांव तक से निकाल दिया गया। ऐसे ही लोगों को दिल से लगाया और उसकी सेवा जुटे हैं डॉ. तेजस्वी।
डॉक्टरमाता-पिता सेजुदा राह
आमतौरपर देखा गया है कि अगर किसी डॉक्टर कपल का बेटा डॉक्टर बनता है तो वह उसी विभाग या उससे जुड़े किसी स्ट्रीम को अपनाता है, लेकिन डॉ. तेजस्वी ने अपनी राह खुद बनाई। पिता डॉ. केके शरण ईएनटी सर्जन हैं और माता डॉ. किरण शरण शिशु रोग विशेषज्ञ हैं। डॉ दिवाकर तेजस्वी ने इन दोनों विभागों या इससे जुड़े विभाग को नहीं चुना। फिजिशियन के रूप में प्रैक्टिस करते हुए एचआईवी संक्रमित और एड्स पीड़ितों के लिए काम करना शुरू कर दिया।
इथोपियायात्रा ने बदलडाली सोच
नालंदामेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस की डिग्री लेने वाले डॉ. दिवाकर तेजस्वी बताते हैं- यूएनओ के प्रोजेक्ट पर इथोपिया में था। वहां एड्स से उत्पन्न स्थिति को देख कर दंग रह गया। इसके कारण कई घरों में ताले जड़ गए थे। कई बच्चे अनाथ हो गए थे। वहां की स्थिति को देख कर ही मुझे इस रोग के प्रति जागरुकता फैलाने और इस ओर काम करने की प्रेरणा मिली। यूनाइटेड नेशंस डेवलपमेंट प्रोग्राम के तहत इथोपिया की अल्माया यूनिवर्सिटी के हेल्थ साइंसेज विभागाध्यक्ष के रूप में 1998 से 2002 तक काम किया। बिहार वापस आया तो समाज को जागरूक करने के लिए एक एड्स पीड़ित और एक मृतक की विधवा के साथ बातचीत की। उनका जूठा खाना खाया और लोगों को बताया कि उनसे परहेज करें। ये भी समाज के ही लोग हैं।
डॉ दिवाकर तेजस्वी इसके बाद इस रोग के बहुतेरे मरीजों को गले से लगाया। जिसे भी जरूरत पड़ी, हर तरह से मदद की। इसके पीड़ित रोगी को अपना खून दिया। उनके साथ केक काटकर और खाकर अपना जन्मदिन मनाया। समाज में इसके प्रति जागरुकता फैलाने के लिए राज्य के कई जगहों पर सेमिनार आयोजित कर उन्हें बताया कि हमें इसके बचाव के लिए क्या करना चाहिए। समाज को इसके पीड़ित रोगियों को दरकिनार करने की सलाह दी। इसके प्रति काम करने वाले डॉक्टरों अन्य लोगों को उन्होंने आगे बढ़ाया।
समाजसेवा केलिए पहल
एड्ससे जान गंवाने वाले एक व्यक्ति की मौत पर उसके चार बच्चों की डॉ. तेजस्वी ने परवरिश की। पांच बच्चों की पढ़ाई के लिए स्कॉलरशिप प्रदान कर रहे हैं। बिहार में एड्स के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिए नि:शुल्क एड्स जांच तथा जागरूकता कार्यक्रम के अंतर्गत हजारों को लाभान्वित कर चुके हैं। पब्लिक अवेयरनेस फॉर हेल्थफुल एप्रोच फॉर लिविंग (पहल) संस्था के जरिए लोगों को स्वास्थ्य के प्रति जागरूक कर रहे हैं। संस्था के माध्यम से सेमिनार, स्वास्थ्य शिविर आयोजित कर लोगों को बताते हैं कि कैसे आप अपने शरीर के प्रति जागरूक हों।
नवीन चंद्र
ने,गले लगाने या साथ खाने से एचआईवी का संक्रमण नहीं फैलता, एड्स नहीं होता। ऐसी बातें खूब होती हैं, लेकिन पटना के डॉ. दिवाकर तेजस्वी ने इसे प्रायोगिक रूप से दिखाने का जिम्मा उठाया। किसी के कहने पर नहीं। यूएनओ के एक कार्यक्रम में इथोपिया की हालत देखकर बिहार में जागरुकता की अलख जगानी शुरू की थी डॉ. तेजस्वी ने। प्रदेश में व्यक्तिगत स्तर पर ऐसा कार्यक्रम चलाने वाले डॉ. तेजस्वी अकेले हैं।
इस डॉक्टर ने एचआईवी संक्रमित और एड्स पीड़ित मरीजों के प्रति ऐसा व्यवहार किया और करना सिखाया, जिससे उनकी जिंदगी की दुश्वारियां घटे। अमूमन ऐसा देखा जाता रहा है कि जैसे ही किसी के एचआईवी संक्रमित होने का पता चलता है, घर-परिवार और दोस्त-डॉक्टर भी उससे दूरी बना लेते हैं। दर्जनों ऐसे उदाहरण सामने आते रहे हैं, जहां परिवार वालों ने खुद को संक्रमित होने से बचाने की सोच रखते हुए ऐसे व्यक्ति को घर से बेघर कर दिया। जानकारी फैली तो गांव तक से निकाल दिया गया। ऐसे ही लोगों को दिल से लगाया और उसकी सेवा जुटे हैं डॉ. तेजस्वी।
डॉक्टरमाता-पिता सेजुदा राह
आमतौरपर देखा गया है कि अगर किसी डॉक्टर कपल का बेटा डॉक्टर बनता है तो वह उसी विभाग या उससे जुड़े किसी स्ट्रीम को अपनाता है, लेकिन डॉ. तेजस्वी ने अपनी राह खुद बनाई। पिता डॉ. केके शरण ईएनटी सर्जन हैं और माता डॉ. किरण शरण शिशु रोग विशेषज्ञ हैं। डॉ दिवाकर तेजस्वी ने इन दोनों विभागों या इससे जुड़े विभाग को नहीं चुना। फिजिशियन के रूप में प्रैक्टिस करते हुए एचआईवी संक्रमित और एड्स पीड़ितों के लिए काम करना शुरू कर दिया।
इथोपियायात्रा ने बदलडाली सोच
नालंदामेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस की डिग्री लेने वाले डॉ. दिवाकर तेजस्वी बताते हैं- यूएनओ के प्रोजेक्ट पर इथोपिया में था। वहां एड्स से उत्पन्न स्थिति को देख कर दंग रह गया। इसके कारण कई घरों में ताले जड़ गए थे। कई बच्चे अनाथ हो गए थे। वहां की स्थिति को देख कर ही मुझे इस रोग के प्रति जागरुकता फैलाने और इस ओर काम करने की प्रेरणा मिली। यूनाइटेड नेशंस डेवलपमेंट प्रोग्राम के तहत इथोपिया की अल्माया यूनिवर्सिटी के हेल्थ साइंसेज विभागाध्यक्ष के रूप में 1998 से 2002 तक काम किया। बिहार वापस आया तो समाज को जागरूक करने के लिए एक एड्स पीड़ित और एक मृतक की विधवा के साथ बातचीत की। उनका जूठा खाना खाया और लोगों को बताया कि उनसे परहेज करें। ये भी समाज के ही लोग हैं।
डॉ दिवाकर तेजस्वी इसके बाद इस रोग के बहुतेरे मरीजों को गले से लगाया। जिसे भी जरूरत पड़ी, हर तरह से मदद की। इसके पीड़ित रोगी को अपना खून दिया। उनके साथ केक काटकर और खाकर अपना जन्मदिन मनाया। समाज में इसके प्रति जागरुकता फैलाने के लिए राज्य के कई जगहों पर सेमिनार आयोजित कर उन्हें बताया कि हमें इसके बचाव के लिए क्या करना चाहिए। समाज को इसके पीड़ित रोगियों को दरकिनार करने की सलाह दी। इसके प्रति काम करने वाले डॉक्टरों अन्य लोगों को उन्होंने आगे बढ़ाया।
समाजसेवा केलिए पहल
एड्ससे जान गंवाने वाले एक व्यक्ति की मौत पर उसके चार बच्चों की डॉ. तेजस्वी ने परवरिश की। पांच बच्चों की पढ़ाई के लिए स्कॉलरशिप प्रदान कर रहे हैं। बिहार में एड्स के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिए नि:शुल्क एड्स जांच तथा जागरूकता कार्यक्रम के अंतर्गत हजारों को लाभान्वित कर चुके हैं। पब्लिक अवेयरनेस फॉर हेल्थफुल एप्रोच फॉर लिविंग (पहल) संस्था के जरिए लोगों को स्वास्थ्य के प्रति जागरूक कर रहे हैं। संस्था के माध्यम से सेमिनार, स्वास्थ्य शिविर आयोजित कर लोगों को बताते हैं कि कैसे आप अपने शरीर के प्रति जागरूक हों।