‘कत्ल की रात’ अपनी जगह है। अभी जो राजनीतिक हालात हैं, हिसाब है, अंदाज है- 20 फरवरी को ‘कत्ल का दिन’ कहा जा सकता है। दरअसल, इस तारीख को दिन में ही तय हो जाएगा कि जीतन राम मांझी मुख्यमंत्री बने रहेंगे या नीतीश कुमार को कुर्सी मिलेगी, या …? जो भी हो, ‘कत्ल की रात’ अपने हूबहू स्वरूप में दिन में ही दिखेगा। बहरहाल, उस दिन बिहार विधानसभा का सीन कुछ इस प्रकार होगा, बशर्ते सबकुछ अभी जैसा रहे; इसी लाइन पर चलता रहे। मधुरेश का अनुमान...
समय : पूर्वाह्न 11 बजे से विधानसभा शुरू है
दृश्य एक : चीफमार्शल की आवाज-माननीय अध्यक्ष महोदय ...।
विधानसभा उदय नारायण चौधरी आसन (अपनी कुर्सी) पर बैठने के पहले तीन बार (सामने, दाएं, बाएं) गर्दन झुकाकर विधायक और विधान पार्षदों का अभिनंदन करते हैं। (संयुक्त सत्र होने के चलते विधान परिषद के सदस्य भी विधानसभा में हैं। अजीब-सी हलचल। सांसों का डूबना-उतरना। आशंका, भरोसा, शांति के बीच टोकाटाकी भी। जबरिया मुस्कुराहट। चौकस निगाहें। आंखों का कमाल-आग्रह और दबाव वाले इशारे भी। सदन के सभी दीर्घा खचाखच भरे हैं।)।
दृश्य दो : विधानसभासचिव खड़े होते हैं। कहते हैं- महामहिम राज्यपाल महोदय ने बिहार विधानमंडल के संयुक्त बजट सत्र को संबोधित करने की इच्छा व्यक्त की है।
विधानसभा अध्यक्ष- माननीयसदस्यगण, मैं महामहिम राज्यपाल महोदय को लाने (अगवानी) जा रहा हूं। आप लोग अपने-अपने स्थान पर बैठे रहेंगे।
सदनसे बाहर- राज्यपाल केशरी नाथ त्रिपाठी का काफिला चुका है। उन्हें गार्ड ऑफ ऑनर दिया जा रहा है।
तुरंत बाद सदन में- आगे-आगेचीफ मार्शल। फिर राज्यपाल के एडीसी। पीछे बीच में राज्यपाल हैं। एक तरफ विधान परिषद के सभापति अवधेश नारायण सिंह, दूसरी तरफ उदय नारायण चौधरी। पीछे-पीछे राज्यपाल के सचिव ब्रजेश मेहरोत्रा, विधानसभा सचिव, राज्यपाल के आदेशपाल।
(न्याय कीजिएगा महोदय, लोकतंत्र बचाइएगा महोदय…, जदयू की तरफ से ऐसी लाइनें उछल सकती हैं।)
दृश्य तीन : राज्यपालआसन तक पहुंच चुके हैं। उनके अगल-बगल में विधानसभा अध्यक्ष विधानपरिषद सभापति की कुर्सियां लगी हैं। जैसे ही राज्यपाल आसन के पास पहुंच खड़े होते हैं, राष्ट्रगान की धुन शुरू हो जाती है। गजब की शांति। (कमोबेश इसी दौरान फोटोग्राफरों को सदन में प्रवेश की अनुमति मिलती है। कुछ ही मिनट में कैमरे में सबकुछ समेट लेने की होड़)।
दृश्यचार : राज्यपाल अपना अभिभाषण शुरू करते हैं। (नोट:- इस दौरान जदयू यानी नीतीश कैंप की तरफ भारी हंगामा हो सकता है। शांति भी रह सकती है। दोनों स्थिति उस दिन तक के हालात पर निर्भर करेगी।)।
दृश्यपांच : अभिभाषणपूरा हो चुका है। राष्ट्रगान की धुन बजने लगी है। फिर शांति। (राज्यपाल चले जाते हैं। विप के सदस्य भी)
दृश्यछह : विधानसभाअध्यक्ष राज्यपाल को विदा कर अपने आसन पर लौटते हैं। उनके आदेश से कार्यवाही शुरू होती है।
दृश्य सात : मांझीकैंप की तरफ से आवाज गूंजती है- माननीय अध्यक्ष महोदय, मैं प्रस्ताव करता हूं कि यह सदन जीतन राम मांझी सरकार में विश्वास व्यक्त करे। (आरोप-प्रत्यारोप।) विधानसभा अध्यक्ष (सदस्यों को शांत कराते हुए)- प्रस्ताव है कि यह सदन मांझी सरकार में विश्वास व्यक्त करें। जो इसके पक्ष में हैं हां कहें, जो विपक्ष में हैं ना कहें। (फिर शोर-शराबा।) विधानसभाअध्यक्ष- मैंसमझता हूं में बहुमत है, में बहुमत है, प्रस्ताव स्वीकृत हुआ सदस्यों की जोरदार आवाजें- नहीं महोदय, नहीं है। (संभव है यह प्रस्ताव स्वीकृत कराने के लिए भी मतदान हो).
दृश्य आठ : विचारका प्रस्ताव स्वीकृत कराने में भी यही सीन है। इसकी स्वीकृति के बाद मांझी के अलावा सभी पार्टियों के नेता बारी-बारी से बोल रहे हैं। (गंभीर सवाल-राजनीति इतनी नीचे भी जा सकती है।)
दृश्यनौ : अंतत:घंटी बजती है। विधानसभा के बड़े-बड़े दरवाजों को जोर-जोर से बंद होने की आवाजें। अपनी-अपनी सीटों पर बैठने की दौड़-भाग। घंटी बंद होते ही शांति। विधानसभा अध्यक्ष के कहने पर दोनों पाले वाले विधायक बगल की लॉबी में गए हैं। उनकी गिनती हुई है। उनके दस्तखत लिए गए हैं। परिणाम स्पष्ट हो चुका है। घोषणा बाकी है।
दृश्यदस : विसअध्यक्ष परिणाम घोषित करते हैं। और इसके बाद? बाप रे बाप ...। जी हां, दुनिया को लोकतंत्र की अवधारणा से वाकिफ कराने वाले बिहार में आजकल लोकतंत्र का यही टाइप चल रहा है।
दृश्यग्यारह : जयकारे।फूलमालाएं। जुलूस। दूसरी तरफ लटके चेहरे। इस सवाल का जवाब तलाशते चेहरे कि कहां क्या गड़बड़ा गया? खुद को यह संतोष देते चेहरे कि चलता है; चुनाव में मजा चखाएंगे।
अब सुनिए... हॉर्स ट्रांसपोर्टेशन
राजनीति में नई टर्म-लॉजी आई है- हॉर्स ट्रांसपोर्टेशन। यह हॉर्स ट्रेडिंग का जवाब है। नीतीश कुमार के कैंप ने भाजपा पर हॉर्स ट्रेडिंग (विधायकों की खरीद-फरोख्त) का आरोप मढ़ा। इससे प्रधानमंत्री तक को जोड़ा। मांझी कैंप के खास किरदार वृशिण पटेल का जवाब आया- नीतीश तो हॉर्स ट्रांसपोर्टेशन करा रहे हैं। यानी, अपने टूटे या टूट रहे विधायकों को किसी तरह बचाने के लिए उनको जहां-तहां घुमा रहे हैं।
चलिए, कुर्सी की लड़ाई में चाहे जो जीते, दोनों पात्रों की एक बात कॉमन है। दोनों कह रहे हैं कि हॉर्स ट्रेडिंग हो रही है। कौन खरीद रहा है, कौन ज्यादा खरीदने में कामयाब है, किसे आखिरकार ज्यादा कामयाबी मिली, किसने अधिक दाम दिए-लिए, कौन अपने विधायकों को बिकने से रोक लिया, इसके लिए क्या कीमत देनी पड़ी, यह सब तो 20 फरवरी को पता चलेगा। लेकिन, बयानों का शोर कह रहा- नेता (खासकर विधायक) बिकता है। बिक रहा है। हां, यह बात सामने आने बाकी है कि कौन, कितने हॉर्स पावर का था और इस हिसाब से दाम पाया कि नहीं?
नेता यह बताने भी लगे हैं कि अभी तक इतने विधायक जुटा लिए हैं। उनके दावों को उन्हीं से जोड़ें, तो सीन ऐसा है- नेता जी के कुर्ते की ऊपर वाली जेब में एक विधायक। साइड वाली जेबों में दो-दो। तीन को अपने दिल में छुपा लिया है। गिनती में आठ विधायक हो गए न! आगे कहते हैं- दो-तीन विधायक आंखों में उतरने शुरू हो गए हैं। अठारह-उन्नीस तारीख तक अपने पास होंगे। ऐसा बोल रहे हैं मानो एक झोला विधायक उनके पास हैं। ऐसे ढेर सारे नेता हैं। सभी अपने-अपने आका को रिपोर्टिंग कर रहे हैं। कुछ तो डबल-गेम कर रहे। मांझी कैंप के राजीव रंजन बोल गए कि नीतीश के साथ दिल्ली गए विधायकों में 16 हमारे जासूस हैं। सत्ता के खेल में जासूसी चल रही है। खुद जीतन राम मांझी लगातार कह रहे हैं कि विधायकों को डराया-धमकाया जा रहा है।
घोड़ा मंडी से पॉलिटिक्स में आया हार्स ट्रेडिंग
घोड़ामंडी की शातिर सौदेबाजी कालांतर में “हार्स ट्रेडिंग’ शब्द पा गई। मंडी में, घोड़े की जितनी खूबियां बेचने वाला बता रहा है, वह विश्वसनीय हैं या नहीं, खरीदार के लिए भांपना मुश्किल होता था। लिहाजा, अनैतिक व्यापार की संभावना बनी रहती थी। इसीलिए घोड़ा बेचने वालों को कपटी व्यापारी कहा जाता था। अमेरिका में यह शब्द 19वीं सदी में काफी प्रचलित हुआ जब वहां कारोबार में नैतिकता का लोप होने लगा। बाद के दिनों में हार्स ट्रेडिंग, राजनीतिक गलियारे की शब्दावली बन गई। खासकर निर्वाचित प्रतिनिधियों के बार्गेनिंग पावर के लिए। वैसे प्रतिनिधियों के लिए, जो बिना एहसास कराए सत्ता के दोनों दावेदारों से मोलभाव करते हैं।