एक-दूसरे के बगैर जीना नहीं पड़े
एक-दूसरे के बगैर जीना नहीं पड़े
एमपी जैन ने बताया कि वे दोनों जॉब में रहे, लेकिन उनमें इस बात को लेकर कभी बहस नहीं हुई कि यह मेरा पैसा है और यह तुम्हारा बल्कि जो कुछ भी रहा उन दोनों का रहा। यहां तक कि उन लोगों ने अलग-अलग बैंक एकाउंट भी नहीं खुलवाए। वे हर महीने 10 से 15 हजार रुपए सामाजिक सेवा पर खर्च करते हैं। गीता को तो गहने का शौक है और ही कपड़ों का। जब तक बेहद जरूरी नहीं हो, वह शॉपिंग से भी बचना चाहती हैं। उसके दिमाग में तो बस हर समय दीन-दुखियों की मदद और समाज सेवा ही घूमता रहता है। वह स्पेशल चाइल्ड के लिए काम करने वाली संस्था दीपायतन की बोर्ड आॅफ डायरेक्टर्स की सदस्य है। पर्यावरण की स्वच्छता के लिए काम करने वाली संस्था तरुमित्र की कॉर्डिनेटर भी रह चुकी हैं। जैन ने भी यूनिसेफ के लिए काम किया है और उसकी कई योजनाओं के जिला प्रभारी रह चुके हैं। दोनों ने मिलकर आधार महिला विकास स्वावलंबी सहकारी समिति की स्थापना की है। इसकी गीता अध्यक्ष हैं और एमपी जैन कॉर्डिनेटर। वे दोनों एक दूसरे को प्रेरित और प्रोत्साहित करते हैं। भविष्य की चर्चा होने पर गीता भावुक होकर कहती हैं कि यह सही है कि मृत्यु कभी कभी हमें एक दूसरे से अलग कर देगी, लेकिन भगवान से यही दुआ है कि हमें एक दूसरे के बगैर लंबे समय तक नहीं जीना पड़े।
रिटायर होने के बाद अपना पूरा समय समाज को दे रहे हैं
एम पीजैन और डॉ. गीता जैन पटना के सामाजिक कार्यकर्ताओं के लिए दो जाने-पहचाने नाम हैं। पिछले 20 वर्षों से ये बाल विकास और महिला उत्थान के क्षेत्र में काम करते रहे हैं। बिहार स्टेट शुगर कॉरपोरेशन के वरीय अधिकारी के पद से सेवानिवृत एमपी जैन ने कहा कि शादी से पहले जॉब में था और केवल काम करता था। शादी के बाद प|ी को समाज सेवा में सक्रिय देखकर उससे जुड़ने की प्रेरणा हुई और धीरे-धीरे इसमें मन इतना रम गया कि यह जीवन की पहली नौकरी दूसरी प्राथमिकता हो गई। सेंट जेवियर स्कूल की शिक्षिका रहीं डॉ. गीता जैन ने कहा कि जब शादी हुई, उस समय इंटर में पढ़ती थी। आगे पढ़ना चाहती थी इसलिए उस समय शादी करने की बिल्कुल इच्छा नहीं थीं। शादी के बाद यहां आई तो मालूम हुआ कि जैन साहब भी कुछ ऐसी ही वजहों से शादी नहीं करना चाहते थे। दोनों की शादी परिवार वालों की जिद और हड़बड़ाहट के कारण हुई। इसके बावजूद दोनों की अच्छी बनी।
छिपानाभी नहीं आता
डॉ.गीता