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नदी परियोजना लागू करने से पहले लोगों की राय भी ली जाए
पटना| भारतऔर नेपाल ही नहीं पूरे दक्षिण एशिया में नदियों के पानी का बंटवारे जब भी हो उसमें स्थानीय लोगों के हितों को ध्यान मे रखकर समझौते किए जाएं। एेसे समझौते स्थानीय लोगों के हितों को दरकिनार कर किए जाते हैं और परिणामस्वरूप लोगों को अपनी मूल मिट्टी से विस्थापित होना पड़ रहा है। भारत और नेपाल दोनों देशों की सरकार नीतियां समझौते करने के अलावा परियोजना बनाने में आम नागरिकों का ध्यान नहीं रखती। जनता के हितों में रखकर ही किसी परियोजना बनाई जानी चाहिए, लेकिन ऐसा होता नहीं। इससे पर्यावरणीय असंतुलन भी बढ़ रहा है। इंडो-नेपाल सिविल सोसाइटी की ओर से गुरुवार को राजधानी में आयोजित सेमिनार में वक्ताओं ने यह बात कही।
नेपाल और बिहार खासकर कोशी इलाके से आए इस विषय के जानकारों ने कहा कि नदियों से जुड़ी कोई भी विकास योजना बनाने से पहले वहां के लोगों और पर्यावरण के हित को केंद्र में रखकर सोचना चाहिए। वक्ताओं ने कहा कि सरकार उनकी नहीं सुनती है तो लोगों को संगठित कर आंदोलन तेज किया जाएगा। इस मौके पर देवनारायण यादव, काली देवी, विनय आेहदेदार, नागेंद्र सिंह, रणजीव, विष्णु अवस्थी, कामेश्वर कांति, रवि कुमार धिमरे आदि ने विचार रखे।
इंडो-नेपाल सिविल सोसाइटी का पानी बंटवारे पर सेमिनार