पाएं अपने शहर की ताज़ा ख़बरें और फ्री ई-पेपर

डाउनलोड करें
  • Hindi News
  • मंच पर प्रपंच से नहीं हो सकता हिन्दी का विकास

मंच पर प्रपंच से नहीं हो सकता हिन्दी का विकास

7 वर्ष पहले
  • कॉपी लिंक
हिन्दी विरोध की राजनीति गलत

डॉ.कृष्ण नंदन ठाकुर, अनीसाबाद

हिंदीके संबंध में देश के अंदर कुछ राज्यों की नीति सचमुच आत्मघाती है। हिंदी विरोध तमिलनाडु के राजनीतिज्ञों के लिए शतरंज की गोटी है। आज भी तमिलनाडु में हिंदी फिल्मों का बोलबाला है। राजनेताओं को जब हिंदी से कमाने की सूझेगी तो वे हिंदी फिल्में बनाएंगे, उसकी पटकथा लिखेंगे, उसमें काम करना भी गौरव की बात समझेंगे। यह कैसा हिंदी विरोध हुआ।

आज सरकारी बैंकों में राजभाषा अधिकारियों का एक संवर्ग तमिलनाडु और दक्षिण के अन्य राज्यों से काफी बड़ी संख्या में रहे हैं, जो इनके हिंदी विरोध के खोखलेपन को दिखलाता है। देश के नेताओं को प्रधानमंत्री का अनुकरण करना चाहिए। इसी स्थिति में कर्पूरी ठाकुर ने एक आदेश के तहत यह निश्चित कर दिया था कि सिर्फ हिंदी टिप्पणी ही फाइल पर स्वीकार्य होगी। यह समय की मांग है कि केंद्र सरकार देश के शेष राज्यों को जो क, क्षेत्र में आते हैं, उन्हें अनिवार्य रूप से हिंदी में काम करने का आदेश दे। क्षेत्र के राज्यों को इस काम के लिए दिया गया समय समाप्त हो गया है, वहां हिंदी में टिपप्णी अनिवार्य बनाएं। अन्यथा, हिंदी दिवस समारोह एक रस्म अदाएगी बनकर रह जाएगी।

व्यावहारिक पक्षाें पर हो चर्चा

सतीशप्रसाद सिन्हा, बेली रोड

हिंदीका इतिहास देखें तो पाएंगे कि हमारे पूर्वज साहित्यकारों ने इसे स्थापित और समृद्ध करने में अपना सारा जीवन खपा दिया। आज के वरिष्ठ और कनिष्ठ साहित्यकारों का कर्तव्य बनता है कि हिंदी दिवस के बहाने इसके भूत, वर्तमान और भविष्य की दशा-दिशा पर चर्चा करें। हिंदी दिवस पर केवल इसके साहित्यिक पक्ष पर विचार-विमर्श हो, बल्कि इसके विकास के लिए व्यावहारिक पक्षों पर भी गंभीरता से विचार हो। आज साहित्य की अनेक विधाओं में पर्याप्त मात्रा में लेखन हो रहा है। यह प्रसन्नता की बात है, परंतु तकनीकी विषयों पर लेखन लगभग शून्य है। सदियों पहले जब संस्कृत आम भाषा थी तो राजनीति शास्त्र, अर्थशास्त्र, स्वास्थ्य, चिकित्सा शास्त्र आदि लिखे गए। आज हिंदी में इस प्रकार की पुस्तकों का अभाव है। जापान, चीन, कोरिया, फ्रांस ने अपनी ही भाषा में तकनीकी लेखन के जरिए अपना विकास किया है। हिंदी इतनी पुरानी और स्थापित होकर भी इस मामले में गरीब है और विदेशी भाषाओं पर निर्भर है। भारत में अधिसंख्य हिंदी बोलते ही नहीं, हिंदी में सोच