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आज भी किसी दलित का चुनाव लड़ना विरोधियों को स्वीकार नहीं

7 वर्ष पहले
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पूर्व सांसद, भाकपा माले

मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी कह रहे हैं कि दलित अगर एकजुट हुए, तो प्रदेश का अगला मुख्यमंत्री भी दलित ही होगा। लेकिन ठोस धरातल की कहानी कुछ और ही बयां कर रही है। खुद मुख्यमंत्री मांझी के गृह जिले गया में मांझी बिरादरी के लोगों को सामंती अत्याचार के कारण गांव छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा।

अर्जुन मांझी की हत्या सिर्फ इसलिए की गई, क्योंकि वह पैक्स का चुनाव लड़ना चाहता था। बात यहीं खत्म नहीं होती, हत्या के बाद चार दिनों को जिले का कोई अधिकारी देखने तक नहीं गया। हत्या करने वालों को पकड़ने के बजाय मांझी परिवारों पर लगातार दबाव बनाया जा रहा था कि वे एफआईआर में किसी का नाम दें। दलितों को गांव से पलायन करने पर मजबूर होना पड़ा। पलायन भी वे दिन में नहीं कर सके, उन्हें रात में गांव से भागना पड़ा।

पिछले दिनों दलितों पर अत्याचार की घटनाएं बढ़ी हैं। नवादा में दलितों पर अत्याचार हुआ। पटना जिले के लहसुना में 60 घर दलित थे, उन्हें गांव से उजाड़ दिया गया। पालीगंज के मउरी में भी ऐसी ही घटना हुई। बिहटा के नेउरी में दलित महिला की हत्या कर दी गई। बिक्रम के कनपा में दलितों को भूदान की जमीन दी गई थी, उसी जमीन को शराब फैक्ट्री खोलने के लिए दे दिया गया। आज तक दलित अत्याचार की घटनाओं के बाद कहीं मुख्यमंत्री नहीं पहुंचे। एक तरफ दलितों के नाम की माला जरूर जपी जा रही है, वहीं दूसरी ओर दलितों पर अत्याचार करनेवालों को ही बचाया जा रहा है।