विनोद प्रसाद
पाठ्यपुस्तक की यह कविता
उसके मासूम हृदय पर
प्रश्नचिह्न अंकित कर गई
लोरियां गा कर मुन्ने को सुलाती
मां की वह तस्वीर, आज के परिवेश में
धूमिल पड़ गई
ममत्व की भावनाओं पर
खोखली आधुनिकताओं की
परत-दर-परत, चढ़ गई है
मां से मम्मी तक का फासला
काफी गहराई तक कुरेदता है
नींद नहीं आती...
किटी पार्टी के बाद
पापा के गले में बांहें डाल
अपने कमरे की ओर जाती
मम्मी का वात्सल्य कहीं मर गया है
चाहकर भी वह पूछ सकी
-‘राजा था या रानी’
क्योंकि तीन इक्कों के आगे
राजा-रानी की जोड़ी नहीं चलती
वह संकल्प लेती है
कि पुनरावृत्ति नहीं होगी
वह लुटाएगी असीमित प्रेम
सुनाएगी कहानियां, लोरियां
वह मां बनना चाहती है, मम्मी नहीं।