नरेंद्र कुमार कवि, पटना
नरेंद्र कुमार कवि, पटना
सड़ांध
शहर के
रिहायशी इलाके से
अलग-थलग
पड़ी थी वह कब्रगाह
समस्या बनकर
जनजीवन की
शहर की तरफ
हवा के झोंकों के साथ
आती रहती सड़ांध
उन कब्रों से
अनेक बार डाली गई मिट्टी
पर आती ही रहती
वह तीखी सड़ांध
फिर से खोदी जातीं कब्रें
मुर्दे जागे मिलते हर बार
देने लगते बयान
क्षत-विक्षत कर
डाल दिए जाते
और भी गहरे
कभी आए नहीं हाकिम
लिए नहीं गए उनके बयान
और वह तीखी सड़ांध
आज भी, वहां से आती है।