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बच्चों के परिजन बचाते हैं बाल तस्करों को

6 वर्ष पहले
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बीमारी से परेशान हो बच्चों को छोड़ जाते हैं परिजन

गवाही नहीं देने के कारण 88 फीसदी केस रह जाते हैं पेंडिंग

चूड़ीफैक्ट्रीसे छुड़ाकर लाए बच्चों के मामले में हैदराबाद के बाद अब पटना में भी मामला दर्ज कराने की तैयारी की जा रही है। हैदराबाद में बाल तस्करी समेत विभिन्न धाराओं में मामला दर्ज किया गया था। बच्चों से बातचीत के आधार पर आरोपियों पर मामला दर्ज कर दोषी सभी लोगों पर कार्रवाई का दावा किया जा रहा है। इस बार दावे भले हवा हों और कार्ययोजना के तहत काम हो, लेकिन नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो के ऐसे मामलों की पिछली रिपोर्ट साफ करती है कि बाल तस्करी के नेटवर्क में शामिल ज्यादातर लोग गवाह नहीं मिलने के कारण बच निकलते हैं। और, बच्चों के परिजन ही इन्हें बचाने में प्रमुख भूमिका निभाते हैं। प्रदेश में 88 फीसदी केस पेंडिंग रह जाते हैं।

4620मामले आए, मगर 27 में ही फाइनल रिपोर्ट

डीबीस्टार की पड़ताल में सामने आया कि राज्य में अपहरण के काफी कम मामलों में आरोपियों को दोषी साबित किया जा सका है। एनसीआरबी की रिपोर्ट के मुताबिक बिहार में साल 2013 के दौरान मात्र 11.5 फीसदी मामलों में आरोपियों को दोषी साबित किया जा सका था। देशभर में अपहरण के मामले में 32593 पेंडिंग थे। इनमें बिहार में केस की संख्या 4620 रही है। यही नहीं, साल 2013 में मात्र 27 मामलों में फाइनल रिपोर्ट समिट की जा सकी है। अपहरण के मामलों की पेंडेंसी रेट 88.5 फीसदी है।

ज्यादातरमामलों में नहीं सामने आते हैं गवाह

पड़तालमें सामने आया कि बच्चों को छुड़ाए जाने या फिर नियम के मुताबिक एक निश्चित समय सीमा से ज्यादा दिन तक गुमशुदगी के बाद अपहरण का मामला दर्ज कर लिया जाता है। मामला एंटी हृयूमन ट्रैफिकिंग यूनिट को जांच-पड़ताल के लिए सौंप दिया जाता है। यहीं से पुलिस की परेशानी शुरू हो जाती है। शुरुआती जांच में पुलिस पूछताछ में आरोपियों को गिरफ्तार तो करती है, लेकिन मामले में ज्यादातर जान-पहचान या फिर नजदीकी रिश्तेदार होने की वजह से गवाह सामने नहीं आते हैं। कई बार पारिवारिक और सामाजिक दबाव की वजह से परिजन केस से दूर भागते रहते हैं। किसी-किसी मामले में ही गवाही दर्ज हो पाती है, ज्यादातर में गवाह मुकर जाते हैं। ऐसे में दलाल आसानी से पुलिसिया चंगुल से मुक्त हो जाते हैं। ऐसे मामले केस बनकर रह जाते हैं।

केस |एक

16साल की एक अज्ञात लड़की ने पटना जंक्शन के प्लेटफॉर्म संख्या एक पर बच्चे को जन्म दिया था। ठंड के कारण लड़की और बच्चे दोनों की स्थिति खराब हो गई। इसे देख स्टेशन प्रबंधन ने चाइल्ड लाइन से संपर्क किया। चाइल्ड लाइन के जरिए उसे पीएमसीएच में भर्ती कराया। उस लड़की ने बताया कि कुछ लोगों ने उसे डरा-धमका कर प्लेटफॉर्म पर रखा था। इलाज के बाद उस लड़की को बालिका गृह के संरक्षण में भेज दिया गया।

केस|दो

15वर्षीय बच्चा कॉन्ट्रेक्टर के जरिए दिल्ली में नौकरी के लिए गया था। बीमार होने पर बच्चे को कान्ट्रैक्टर ने पटना आने वाली ट्रेन पर बैठा खानापूर्ति कर ली। पटना आते-आते उसकी तबीयत ज्यादा खराब हो गई। जीआरपी ने चाइल्ड लाइन को सूचना दी। चाइल्ड लाइन के सदस्यों ने बच्चे को अस्पताल पहुंचाया। इलाज कराने के बाद उसे उसके घर पहुंचाया गया।

चाइल्ड लाइन में कर्मियों की संख्या है कम

^पटनास्थितचाइल्ड लाइन में पहले 13 कर्मी थे। अब इसे घटाकर 9 कर दिया गया है। सदस्यों की कमी की वजह से कार्य में परेशानी रही है। हमारी पूरी कोशिश होती है की परेशानी में फंसे बच्चे को मदद पहुंचाई जाए।

जीतेन्द्रकुमार सिंह,

कोआर्डिनेटर पटना चाइल्ड लाइन

जिलों में प्रदेश में है चाइल्ड लाइन

13

में कुल 486 मामले अाए पटना चाइल्ड लाइन में

2014

बाल मजदूरी के दौरान छुड़ाए बच्चों को कई बार उनके मां-बाप दोबारा मौत के मुंह में धकेल देते हैं, तो कई बार यह दोबारा दलालों के चंगुल में फंस जाते हैं। ऐसे में अब शिक्षा विभाग और श्रम संसाधन बाल मजूदरी में छुड़ाए गए बच्चों पर विशेष नजर रखेगा। इसके तहत बच्चों की काउंसलिंग के बाद बच्चों को परिजनों को सौंपा जाएगा। जिन बच्चों के परिजन के बारे में जानकारी नहीं मिल पाएगी, उनकी पढ़ाई आदि की व्यवस्था बाल कल्याण समिति करेगी। जिन बच्चों को परिजनों के जरिए स्कूल में दाखिला दिलाया जाएगा, वहां के प्रिसिंपल को बच्चों पर नजर रखने की जिम्मेदारी दी जाएगी। प्रिंसिपल करीब साल भर तक प्रत्येक माह शिक्षा और श्रम संसाधन विभाग को बच्चों की उपस्थिति का रिकार्ड उपलब्ध कराएंगे। इसके अलावा बच्चों की प्रोगेस रिपोर्ट भी सौंपी जाएगी।

हैदराबाद से मुक्त होकर गुरुवार को पटना पहुंचे बच्चों के चेहरे पर खुशी देखती बन रही थी, लेकिन यह तस्वीर दरअसल बिहार से बाल तस्करी की वास्तविक स्थिति सामने ला रही है।

अब कई स्तर पर तैयार होगी रिपोर्ट

हैदराबाद से छुड़ा कर लाए बच्चों की जांच रिपोर्ट तैयार की जाएगी। श्रम संसाधन विभाग के सचिव एस सिद्धार्थ ने बताया कि जांच के लिए लेबर कमिश्नर के साथ दो सदस्यीय कमेटी बनाई गई है। कमेटी हैदराबाद पुलिस, बच्चों, उनके परिजनों और पुलिस जांच के आधार पर एक रिपोर्ट तैयार करेगी। इसमें यह जानने की कोशिश की जाएगी कि बच्चों को एक साथ या अलग-अगल समूह में हैदराबाद ले जाया गया। इस दौरान ट्रेन के सफर में रेलवे पुलिस की भूमिका पर रिपोर्ट तैयार की जाएगी। इसमें यह भी जांचने की कोशिश की जाएगी कि क्या इतने ही बच्चे ले जाए गए थे, या फिर संख्या ज्यादा थी।

बिहार में निम्न आय वर्ग के परिवार से आने वाले बच्चों की स्थिति सचमुच बेहद चिंताजनक है। डीबी स्टार ने रविवार के अंक में सामने लाया था कि कैसे मां-बाप भी अपने बच्चों को बाल तस्करों के हवाले कर देते हैं। इसी पड़ताल के क्रम में दो और बातें सामने आईं। दोनों ही बातंे ऐसे बच्चों के परिजनों की आिर्थक-सामाजिक और मानसिक स्थिति को सामने ला रही हैं। हैदराबाद से छूट कर आए बच्चों के पुनर्वास के दावों के बीच नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो के पिछले आंकड़े यह बताते हैं कि कैसे बच्चों के परिजन ही बाल तस्करों को बचा लेते हैं। एक और आंकड़ा कम आय वर्ग के परिवार में जन्म लेने वाले बच्चों की हालत बयां करता है। चाइल्ड लाइन के पटना सेंटर के रिकार्ड को देखें तो साल 2014 में कुल 486 बच्चे इसके पास पहुंचे। इनमें सर्वाधिक 226 बच्चे ऐसे थे, जिन्हें बीमारी आदि की वजह से परिजनों ने रास्ते पर कहीं छोड़ दिया था।

^ बालमजदूरी से छुड़ाए गए बच्चों पर अब सीधी नजर रखी जाएगी। जिन स्कूलों में इन बच्चों को दाखिला दिलाया जाएगा, वहां से करीब साल भर तक प्रति माह बच्चों की उपस्थिति और प्रोग्रेस रिपोर्ट ली जाएगी।

एस.सिद्धार्थ,

सचिव श्रम संसाधन विभाग

^ हैदराबादसे छुड़ाए बच्चों के मामले में काउंिसलिंग के आधार पर प्लान तैयार किया जाएगा। प्रत्येक बच्चे के हिसाब से एजुकेशन प्लान के तहत शिक्षा आदि की व्यवस्था की जाएगी। मामले से जुड़े अन्य विभागों से भी बातचीत कर इनकी सहायता करने की कोशिश की जाएगी।

इमामुद्दीनअहमद,

निदेशक, समाज कल्याण निदेशालय