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केमिकल रेफ्रिजरेटर, यह है साइंस कॉलेज की लेबोरेट्री

6 वर्ष पहले
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अनुपम कुमार > पटना 9334940256

विज्ञानप्रयोगआधारित ज्ञान है और पटना साइंस कॉलेज विज्ञान की पढ़ाई के लिए प्रदेश का सबसे प्रतिष्ठित महाविद्यालय। और, हाल यह है कि साइंस कॉलेज की लेबोरेट्री में सारे केमिकल नहीं हैं। ब्लड टेस्ट करना हो तो छात्र खुद अपना या सहपाठी का रक्त निकालते हैं। बिजली गुल रहने पर जेनरेटर का संकट पता चलता है। ज्यादातर जगह जेनरेटर की व्यवस्था नहीं है। मोबाइल लाइट में प्रैक्टिकल करना पड़ता है और बिना प्रीजर्वेटर डिसेक्शन को रखना पड़ता है।

अपनेब्लड से टेस्ट

ब्लडबैंक से प्रैक्टिकल के लिए ब्लड लेने की व्यवस्था नहीं है। जूलॉजी लैब में पैथोलॉजिस्ट भी नहीं हैं। पहले कबूतर, मेढ़क, गिनी पिग आदि के खून का इस्तेमाल किया जाता था। अब यूजीसी द्वारा प्रैक्टिकल के लिए जीवित पशु-पक्षी के खून के इस्तेमाल पर रोक लगाए जाने के बाद स्टूडेंट कई बार खुद अपना रक्त निकाल ब्लड टेस्ट का प्रैक्टिकल करते हैं। डब्ल्यूबीसी, आरबीसी, हीमोग्लोबीन, ब्लड ग्रुप टेस्ट तो अपने खून से कर भी लेते हैं, लेकिन ईएसआर नहीं हो पाता है।

एकलेक्चर हॉल में 750

जूलॉजीयूजी विभाग में अॉनर्स और सब्सिडियरी मिला कर तीन पार्ट में कुल 750 विद्यार्थी पढ़ते हैं, लेकिन इनके लिए मात्र एक लेक्चर हॉल और एक लैब है। एक सेक्शन में 120 छात्र हैं जबकि लेक्चर हॉल की क्षमता बमुश्किल 80-90 छात्रों की है। छात्रों को किसी तरह बैठना पड़ता है।

जेनरेटरचलते नहीं

कईविभागों में जेनरेटर है, लेकिन ज्यादातर में बेकार है। फिजिक्स डिपार्टमेंट में लाखों का साइलेंट जेनरेटर कुछ दिन चलने के बाद से ही बंद है। कॉलेज प्रशासन की मानें तो यूजीसी के साथ किसी तकनीकी मतभेद के कारण ऐसा है। जूलॉजी विभाग में 15 वर्ष पहले जेनरेटर खरीदा गया। बिना एक महीना भी चले यह जेनरेटर बंद हो गया। लगभग दस साल बाद इस जेनरेटर में मरम्मत की बात उठी तो पता चला कि नए जेनरेटर की कीमत से भी अधिक उसमें खर्च आएगा। उसके बाद इन्वर्टर की योजना बनी लेकिन पिछले तीन-चार वर्षों में यह भी आगे नहीं बढ़ पाई है। कई अन्य विभागों में भी बेकार जेनरेटर लगे हैं। पहले पीएमसीएच वाले फेज से कनेक्शन होने के कारण काॅलेज परिसर में बिजली बहुत कम गुल होती थी, लेकिन अब इसे सामान्य फेज में कर दिए जाने के कारण लाइट बराबर कटती है। छात्र मोबाइल की लाइट में प्रैक्टिकल करते हैं। जूलॉजी का प्रैक्टिकल नहीं हो पाता क्योंकि बिना बिजली माइक्रोस्कोप नहीं चल पाते।

बिना रेफ्रिजरेटर के चल रहा लैब

लाइवसाइंस होने के बावजूद जूलॉजी लैब में काम लायक रेफ्रिजरेटर नहीं है। एक टूटा फूटा पुराना रेफ्रिजरेटर है, जिसका इस्तेमाल अलमीरा के रूप में किया जा रहा है। ऐसे में डिसेक्शन को कहां प्रीजर्व किया जाए, यह एक समस्या बन गई है। इससे कम तापमान पर स्टोर किए जानेवाले केमिकल के रखरखाव में भी समस्या रही है।

केमेस्ट्री लैब है, मगर केमिकल नहीं

केमेस्ट्रीके छात्र केमिकल नहीं मिलने से परेशान हैं। उनके बिना प्रैक्टिकल संभव नहीं और बिना प्रैक्टिकल कॉन्सेप्ट नहीं स्पष्ट हो पाता। प्राध्यापकों और कॉलेज प्रशासन से शिकायत करने पर राशि की कमी और केमिकल के दाम बढ़ने का हवाला दिया जाता है।

पटना साइंस कॉलेज के प्राचार्य प्रो. यू के सिन्हा से सीधी बात

नेशनल-इंटरनेशनलस्तर का प्रैक्टिकल तो संभव नहीं है

क्या आप प्रैक्टिकल के स्तर से संतुष्ट हैं?

हमस्टूडेंट से साल में ट्यूशन फी अन्य राशि के रूप में लगभग 3000 रुपए लेते हैं। इसमें 40 फीसदी राशि विवि को भेजनी पड़ती है और 60 फीसदी ही हमारे पास बचती है। केमिकल के दाम दिन-ब-दिन बढ़ते जा रहे हैं। तकनीकी विशेषज्ञों की भी कमी है। ऐसे में इतनी कम राशि से नेशनल या इंटरनेशनल स्तर का प्रैक्टिकल कराना संभव नहीं।

छात्रोंको प्रैक्टिकल के लिए खून नहीं मिलता?

यूजीस्तर पर केवल ग्रुप टेस्ट कराया जाता है। वह हम स्टूडेंट के अपने खून से ही करा देते हैं क्योंकि दूसरे का खून इस्तेमाल करने पर संक्रमण की आशंका रहती है।

जेनरेटरहैं लेकिन चलते नहीं?

साइंसकॉलेज के पास इतना पैसा नहीं है कि वह जेनरेटर मेंटेन कर सके। सेल्फ फाइनेंस वाले कोर्स इसे मेंटेन कर रहे हैं।

^न मॉडल पर डिसेक्शन सिखाया जाता है और ही जानवर पर प्रयोग। कॉन्सेप्ट क्लियर नहीं हो पाता है।

विवेककुमार, जूलाॅजीविभाग

^प्रैक्टिकल के लिए केमिकल की कमी है। लाइट जाने पर अंधेरा हो जाता है। एग्जाम के समय परेशानी बढ़ जाती है।

राहुलकुमार, जूलॉजीविभाग

जूलॉजी विभाग का यह जेनरेटर खरीद के बाद कुछ ही दिन चला, उसके बाद से बंद है। इनसेट में फिजिक्स विभाग का साइलेंट जेनरेटर। यह शायद चला ही नहीं। जूलॉजी विभाग का फ्रिज देखिए, जरा किस हाल में है।

शिक्षा के स्तर को बनाए रखना चुनौतीपूर्ण

^लैबमेंजरूरी सुविधाएं नहीं हैं। जगह की भी कमी है। ऐसे में शिक्षा के स्तर को बनाए रखना निश्चय ही चुनौतीपूर्ण हो गया है। कई बार विवि को सूचित किया, लेकिन अब तक कुछ नहीं हुआ।

डॉ.अहिल्या सिन्हा

जन्तुविज्ञानविभागाध्यक्ष

पटनासाइंसकॉलेज

राशि की कमी के आधार पर लैब में जरूरी सुविधाएं भी नहीं