इतिहास कल्पना का कॉकटेल
जीवनमें कई दौर ऐसे आते हैं जब चारों ओर अंधेरा ही अंधेरा दिखता है। समाज में अंधकार का दौर तब चलता है जब लोग ज्ञान को भूल अंधविश्वास की शरण में चले जाते हैं। यह तब भी फैलता है जब तर्क और विज्ञान को लोग नजरअंदाज करने लगते हैं। अंधेरे अौर समाज के इन्हीं रिश्तों को दिखाया गया गुरुवार को कालिदास रंगालय में। यहां चल रहे छठे अखिल भारतीय ऐतिहासिक नाट्य महोत्सव 2015 के दूसरे दिन नाटक री-एक्सप्लोरेशन का हिन्दी में मंचन किया गया। नाटक का मंचन पश्चिम बंगाल के नाट्य दल शाइन के बैनर तले शुभोजित बंधोपाध्याय के निर्देशन में किया गया।
नाटकका नया नजरिया
इसमेंविलियम शेक्सपीयर के नाटक को एक नए नजरिए से देखने का प्रयास किया गया। इसमें यह सवाल करता है कि शेक्सपीयर का चर्चित पात्र मैकबेथ कौन था? उसकी प्रासंगिकता क्या थी और क्यों और कैसे मैकबेथ शेक्सपीयर के चिंतन का हिस्सा बन गया। नाटक में डर और बेचैनी से घिरी रात को दिखाया गया। नाटक बताता है कि मैकबेथ का मुख्य पात्र मैकबेथ का स्रोत शेक्सपीयर ने किंग जेम्स की कहानी से लिया है। उस समय इंगलैंड के समाज में डायन और बुरी आत्माओं पर लोगों का जबरदस्त विश्वास था। लोगों के दिल दिमाग पर अंधविश्वास का गहरा असर था। यह सारी चीजें लोगों मनोवैज्ञानिक स्तर पर लोगों के साथ चल रही थी। नाटक में अंधेर का इतना गहरा अर्थ है कि कई सपने और भविष्यवाणियां लोगों की अचेतन मन में करवटें लेती रहती हैं। नाटक में चारों ओर फैले राजनीतिक दुख के साथ ही जीवन के दर्शन को भी बखूबी दिखाया गया है। पूरे नाटक में निर्देशक ने शेक्सपीयर के बहाने इतिहास और कल्पना का खूबसूरत कॉकटेल बनाने का प्रयास किया है।
कालीदास रंगालय में नाटक री-एक्सप्लोरेशन का मंचन करते कलाकार। नाटक में अंधविश्वास का मुद्दा भी उठाया गया है।
{निर्जहर दास, मंजिरा डे, अनिरुद्ध विश्वास, शुबहोमे डे, सुतानु पाण्डा, बिरेंद्र बाल्मिकी, लोकनाथ चक्रवर्ती, शुभानु बनर्जी, देवब्रत पाल, सौरभ बनर्जी।
{आलेख - हिमाद्री शेखर डे
{निर्देशक - शुभोजित बंधोपाध्याय
{प्रकाश - शेखदीप विश्वास
{संगीत - सौम्यदेव बसु
{वस्त्र विन्यास - मंजिरा डे