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सर्वे में खुलासा: मूल सुविधाओं से वंचित हैं बिहार के बच्चे

9 वर्ष पहले
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पटना। एक और सर्वे रिपोर्ट ने खुलासा किया है कि बिहार में गरीब बच्चों के लिए चलने वाली बाल विकास परियोजना का हाल-हवाल ठीक नहीं है। खासकर महादलित बच्चों तक इसकी पहुंच अत्यंत खराब है। करीब 50 फीसदी जीरो से छह साल तक के बच्चों तक ही आंगनबाड़ी केंद्रों के फायदे मिल पा रहे हैं।
हाल ही में महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना मनरेगा को लेकर दिल्ली की एक गैर सरकारी संस्था सेंटर फॉर इन्वायरमेंट एंड फूड सिक्योरिटी (सीएफईएफएस) ने सौ गांवों की सर्वे रिपोर्ट में बताया था कि बड़े पैमाने पर मजदूरों के पैसों की लूट की गयी है। दस जिलों में सीएफईएफएस ने सर्वे के आधार पर पूरे राज्य मे मनरेगा में छह हजार करोड़ से अधिक के पैसों की लूट का ब्योरा जारी किया तो राजनीतिक-प्रशासनिक स्तर पर खलबली मच गयी थी।
अब लोक अधिकार मंच और चाइल्ड राइट्स एंड यू ने राज्य में चलने वाले आंगनबाड़ी केंद्रों के बारे में सर्वे रिपोर्ट जारी किया है। राज्य में 91 हजार 677 आंगनबाड़ी केंद्र चल रहे हैं। पर बच्चों की कुल आबादी का 45 परसेंट ये केंद्र कवर नहीं कर पा रहे हैं। 20 जिलों में चल रहे 45 हजार से अधिक केंद्रों में से 200 केंद्रों का जायजा लिया। ये केंद्र दलित व महादलित बस्तियों के बच्चों के लिए थे। पाया गया कि इनमें से महज नौ परसेंट के पास ही टायलेट की सुविधा है और 38 परसेंट के पास ही शुद्ध पेयजल की व्यवस्था है।
यह हालत तब है जब राज्य के आंगनबाड़ी केंद्रों को वेब बेस्ड रिपोर्टिग से जोड़ा गया है। देश में यह पहला प्रयोग बिहार में किया गया था। इसके बावजूद केंद्रों की दशा नहीं सुधर पा रही है। डिपार्टमेंट ऑफ इंटरनेशनल डेवलपमेंट की रिपोर्ट है कि 45 परसेंट आंगनबाड़ी केंद्र ही हर दिन खुल पाते हैं। औसतन इन केंद्रों पर 24 बच्चे ही पहुंच पाते हैं जो निर्धारित संख्या से आधा है। सरकार का दावा है कि इन केंद्रों से 65 लाख बच्चे और 13 लाख गर्भवती महिलाओं को कवर किया जाना है।
यह भी तथ्य है कि आंगनबाड़ी केंद्रों में भारी भ्रष्टाचार को देखते हुए करीब 1600 सेविकाओं को सेवा से मुक्त कर दिया गया। 3 परियोजना पदाधिकारियों को बर्खास्त किया गया और 35 पर निलंबन की तलवार लटकी है।