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लंदन में बोले मुख्यमंत्री : ' बिहार के पिछड़ेपन के लिए केंद्र की सरकारें जिम्मेदार'

7 वर्ष पहले
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(लंदन में मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी ने उद्योगपतियों से मिलकर उन्हें बिहार में निवेश के लिए बेहतर माहौल उपलब्ध कराने का आश्वासन दिया)
पटना. राज्य के पिछड़ेपन के लिए मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी ने केंद्र की सभी सरकारों को जिम्मेदार बताया है। ब्रिटेन में बिहार के विकास की गाथा सुनाने गए मुख्यमंत्री ने लंदन स्कूल आॅफ इकोनॉमिक्स में यह बात कही।
बिहार की गाथा : राज्य के पुनरुत्थान, समावेश और विकास विषय पर मांझी ने हिंदी में व्याख्यान दिया। बिहार के पिछड़ेपन के लिए उन्होंने अंग्रेजों से लेकर 2005 से पहले की सरकारों को जिम्मेदार ठहराया। मुख्यमंत्री ने कहा कि हमने आर्थिक गतिशीलता को बढ़ाया। बिहार आज भारत के सबसे तेज विकास दर वाले राज्यों में एक है।
बिजली की कमी और उद्योगाें के जमीन की कमी को मांझी ने अपनी सरकार के सामने बड़ी चुनौती माना। फिर भी, आर्थिक प्रदर्शन को विकास का पैमाना मानने इंकार किया। कहा - विकास का मतलब एक न्यायसंगत और न्यायप्रिय समाज का निर्माण करना है। राज्य की आर्थिक गतिशीलता को कायम रखने, इसे अधिक समावेशी और टिकाऊ बनाने के लिए विशेषज्ञों के सहयोग की जरूरत बताते हुए उन्होंने सभी से सहयोग की अपील भी की।
बिहार का हमारी सरकार ने किया विकास : मांझी
मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी ने लंदन में कहा कि हमारी सरकार ने तमाम संस्थात्मक अवरोधों को हटाते हुए राज्य को क्रियाशील बनाया। कुछ वर्षों की छोटी अवधि में ही हमने उन सार्वजनिक संस्थाओं का पुनर्निर्माण किया, जो दशकों से कुशासन के कारण नष्ट हो गई थीं। वर्ष 2005 में जब हमारी सरकार सत्ता में आई, तब प्रदेश के 54 प्रतिशत लोग गरीबी रेखा से नीचे थे। योजना आयोग की ताजा रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2011-12 में बीपीएल अनुपात घटकर 33 प्रतिशत हो गया। मात्र पांच वर्षों में गरीबी में 20 प्रतिशत से अधिक की कमी से पता चलता है कि आर्थिक विकास के लाभों में व्यापक हिस्सेदारी हो रही है और यह समावेशी प्रकृति का है।
अंग्रेजी राज से ही हो रहा भेदभाव : मुख्यमंत्री ने कहा- बिहार के अविकसित रहने के संबंध में आम धारणा है कि आजादी के बाद से अबतक की पूर्ववर्ती सरकारों में अच्छे शासन की कमी। इससे इनकार नहीं किया जा सकता है कि 10 साल पहले तक बिहार के शासन की गुणवत्ता संतोषजनक नहीं रही है, लेकिन इसे बिहार के पिछड़ेपन का मुख्य कारण मानना गलत होगा। बिहार साम्राज्यवादी शासन में बंगाल प्रेसिडेंसी का एक हिस्सा था। उस समय भी बिहार का प्रति व्यक्ति वार्षिक व्यय देश में सबसे कम था।
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वर्ष 1912-13 में बिहार में प्रति 1000 आबादी पर वार्षिक सार्वजनिक व्यय 1212 रुपए था, जबकि बंबई प्रांत में 5579 रुपए। उन्होंने कहा कि भारत के आजाद होने पर भी आधारभूत संरचना, औद्योगीकरण और सामाजिक विकास के सूचकांक में बिहार सबसे निचले पायदान पर था। यह परिस्थिति तब और गम्भीर हो गई, जब केंद्र सरकार ने राज्यों को गरीबी से उबारने के लिए त्रुटिपूर्ण नीतियां अपनाई।
अन्याय का विरोध नहीं कर सकी पूर्ववर्ती सरकारें
मुख्यमंत्री ने कहा कि केंद्र सरकार के त्रुटिपूर्ण नीतियों और अन्याय के खिलाफ लड़ने में पूर्ववर्ती राज्य सरकारों में प्रतिबद्धता की कमी रही। साथ ही बिहार का पुनर्निर्माण करने की दूरदृष्टि का भी अभाव था। वर्ष 2005 में हमारी सरकार बनी, उस समय बिहार को एक असफल राज्य के रूप में देखा जाता था। विधि व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त थी। विभिन्न जातीय समूह अपनी-अपनी निजी सेना रखते थे। इनके संघर्ष में निर्दोष लोगों की हत्या हो जाती थी। सार्वजनिक और सामाजिक आधारभूत संरचना की स्थिति दयनीय थी। राज्य एक दुष्चक्र में फंसा था, जहां भ्रष्टाचार और कानूनविहीनता को न केवल बर्दाश्त किया जाता था, बल्कि इसे महिमामंडित भी किया जाता था।
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