फाइल फोटो: शिवानंद तिवारी।
पटना. शिवानंद तिवारी ने कहा है कि सब कुछ लुटाने के बाद नीतीश कुमार को संगठन और कार्यकर्ताओं की याद आई है। पर ऐसा लगता है कि नीतीश ने अपनी गलतियों से कोई सीख नहीं ली है। आज जरूरत है, इसलिए कार्यकर्ताओं को पुचकार रहे हैं। कल जरूरत पूरी हो जाएगी और कहीं सफलता मिल गई तो आज ही की तरह मलाई खाने दूसरे आ जायेंगे।
सवाल यह है कि नीतीश अपनी गलती को सुधारने का जो आश्वासन कार्यकर्ताओं को दे रहे हैं उसमें सच्चाई कितनी है। अगर पिछले उपचुनाव के उम्मीदवारी को देखा जाए तो वही पुरानी उपेक्षा और अन्याय दिखाई देता है। हाजीपुर में दल के पुराने और वफादार कार्यकर्ता देवकुमार चौरसिया को उम्मीदवार क्यों नहीं बनाया गया? अति पिछड़े समाज से आने वाले उस समर्पित कार्यकर्ता को बगावत करने के लिए आपने मजबूर कर दिया। मोनाजीर हसन लोकसभा में दल के एकमात्र मुसलमान सदस्य थे। उनको दोबारा लड़ने का मौका नहीं दिया। यहां तक कि विधान परिषद में भी नहीं भेजा। मजबूरन मोनाजीर भाजपा में शामिल हो गए। बिहार की राजनीति में मोनाजीर जाना-पहचाना चेहरा है।
मोनाजीर के भाजपा में जाने का क्या संदेश बिहार के मुसलमान समाज में गया है। पता नहीं, नीतीश इसको समझ रहे हैं या नहीं। हकीकत तो यह है कि पिछले चार-पांच वर्षों से संगठन में नया प्रयोग हो रहा था। इस प्रयोग में दल के समर्पित कार्यकर्ता अपमानित हो रहे थे। ऐसा नहीं है कि नीतीश कुमार को इसकी जानकारी नहीं थी। लेकिन पता नहीं उस आदमी ने उनके किस कमजोर नस को पकड़ रखा है। आज भी वही स्थिति है। फर्क यही है कि कार्यकर्ताओं की बैठक से फिलहाल समझ-बूझकर उनको अलग रखा जा रहा है।