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बिहार का एक ऐसा स्टेशन, जहां साल में केवल पंद्रह दिन ही रुकती है ट्रेन

7 वर्ष पहले
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फोटो: इन दिनों अनुग्रह नारायण रोड घाट स्टेशन पर यात्रियों को देखा जा सकता है।
औरंगाबाद/पटना. गया-मुगलसराय रेलखंड का अनुग्रह नारायण रोड घाट स्टेशन पूरे साल में मात्र पंद्रह दिनों तक ही अाबाद रहता है। यह मौका तब आता है, जब दुनिया भर के लोग अपने पूर्वजों के मोक्ष के लिए पुनपुन नदी में पहला पिंडदान करने यहां आते हैं। इस क्षेत्र में अनुग्रह नारायण रेलवे स्टेशन मुख्य रेलवे स्टेशन है। जबकि अनुग्रह नारायण रोड घाट स्टेशन हाल्ट है, जिसका नाम भी अनुग्रह नारायण सिंह के नाम पर रख दिया गया। पूर्व में यहां कोई बिल्डिंग नहीं थी। बाद में यहां स्टेशन का एक ढांचा खड़ा कर दिया गया। पुनपुन नदी में पिंडदान के लिए सिर्फ पितृपक्ष में ही यहां लगभग सभी ट्रेनों का ठहराव होता है और दूर-दूर से यात्री आते हैं। लेकिन स्थानीय यात्रियों का आना-जाना रोज ही लगा रहता है और पैसेंजर ट्रेनों का यहां स्टॉपेज है।
रेलकर्मी की स्थायी तैनाती तक नहीं
इस स्टेशन पर टिकट काउंटर, यात्री शेड जैसी तमाम संरचनाएं हैं, पर ‘पितृपक्ष स्पेशल’ इस स्टेशन पर किसी रेलकर्मी की स्थायी तैनाती तक नहीं है। पितृपक्ष के दौरान यहां चार-पांच कर्मियों की अस्थाई तैनाती होती है।
यात्रियों को भारी परेशानी
वर्षों पहले यहां कुछ ट्रेनों को छोड़ सारी ट्रेनों का ठहराव पितृपक्ष के दौरान होता था। अब उपेक्षा की हालत यह है, कि पिंडदानियों के लिए एक-दो पैसेंजर ट्रेनों के अलावा कोई ट्रेन नहीं रुकती, जबकि इस रूट से पितृपक्ष के दौरान गया-जबलपुर, गया-हबीबगंज जैसे स्पेशल ट्रेनें चलाई जा रही हैं। इससे यात्रियों को भारी परेशानी हो रही है।
पिंड़दानियों के लिए खास है यह जगह
पुनपुन नदी के तट पर स्थित इस स्टेशन पर दुनियाभर के हिन्दू उतरते हैं। यहां लोग गया से पहले पिंडदान करने के उद्देश्य से आते हैं। स्थानीय लोगों का मानना है कि मानव रूपी भगवान ने यहां कभी अपने पुरखों के मोक्ष के लिए पहला पिंडदान किया था। इसके बाद से ही यहां पिंडदान करने की परंपरा शुरू हो गई।

यहां है कराेड़ों का धर्मशाला
पिंड़दानियों को ठहरने के लिए कलकत्ता के सेठ सुरजमल बड़जात्या ने सालों पहले यहां तीन एकड़ जमीन में फैले करोड़ों रुपए का एक खुबसूरत धर्मशाला निर्माण कराया था। वर्तमान में वह देख-रेख की अभाव में बर्बाद होने की कगार पर पहुंच गया है।

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