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रहस्य: ​इंसान के आने के पहले ही यहां कोई कर जाता है माता की पूजा!

7 वर्ष पहले
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फोटो: कहा जाता है कि यहां अवस्थित सोमेश्वर महादेव और कालिका के मंदिर में प्रतिदिन किसी मानव के आने के पूर्व ही कोई पूजा अर्चना कर दिया करता है।
बेतिया. पश्चिम चंपारण जिला मुख्यालय से 70 किलोमीटर उत्तर में रामनगर प्रखंड के उत्तरी छोर पर स्थित है गिरीराज हिमालय की सबसे लघु एवं निचली श्रृंखला शिवालिक। मानव विहिन नैसर्गिक छटाओं से परिपूर्ण प्रकृति के इस बीहड़ और विहंगम प्रांगण के बीच शिवालिक की सबसे ऊंची चोटी सोमेश्वर पर स्थित है मां कालिका का मंदिर। जहां विगत दो दशकों से केवल चैत्र नवरात्र में आस्था का जन सैलाब उमड़ता है। चैत्र नवरात्र के नौ दिन खतरनाक पहाड़ी, नदियों, बिहड़ जंगलों और सात पहाड़ियों को पार करती हुई एक से तीन फीट के सकरी, संर्कीण व दुर्गम मार्ग की खड़ी और दुर्गम चढ़ाई से होकर श्रद्धालुओं का आना-जाना होता है। शारदीय नवरात्र के दौरान यहां जाना काफी मुश्किल होता है। क्योंकि इनदिनों नदी में काफी पानी भरा होता है।
वैष्णो देवी से करते हैं तुलना
चंपारण के लोग सोमेश्वर की सबसे ऊंची चोटी पर स्थित मां कालिका की तुलना जम्मू की वैष्णो देवी से करते हैं। कहा जाता है कि यहां अवस्थित सोमेश्वर महादेव और कालिका के मंदिर में प्रतिदिन किसी मानव के आने के पूर्व ही कोई पूजा अर्चना कर दिया करता है।
मां कालिका का इतिहास
कहते हैं कि देवी के परम भक्त रासोगुरु पर देवी की सीधी कृपा थी। वे पत्थर की नाव से पहाड़ की चोटियों की सैर किया करते थे। नाग की रस्सी बनाकर बाघ उनके चिना धान की दवनी करते थे। लेकिन रासोगुरु की इस प्रभुता को हथुवा का राजा स्वीकार नहीं करता था। अपनी प्रभुता को सिद्ध कर राजा को आश्वस्त करने के लिए रासोगुरु ने माता का आह्वान किया। माता ने इसका विरोध किया। लेकिन भक्त के जिद के कारण हथुआ राज के विनाश और रासोगुरु के नाश के पूर्व चेतावनी के रूप में माता ने सोमेश्वर पहाड़ फाड़ कर कंगन सहित अपना हाथ दिखाया था।
अवशेष के रूप में सोमेश्वर की चोटी पर रासोगुरु का खलिहान, पत्थर की नाव और पहाड़ फाड़कर निकला हुआ कंगन सहित माता का हाथ आज भी यहां मौजूद है, जो पत्थर बन चुका है। दूसरी ओर मध्य प्रदेश के राजा विक्रमादित्य के भाई राजा भतृहरि ने इस दुर्गम पहाड़ी के बीच दशकों तक अपनी साधना स्थली बनाई। उसके भी अवशेष यहां है। कहा जाता है कि यहां अवस्थित सोमेश्वर महादेव और कालिका के मंदिर में प्रतिदिन किसी मानव के आने के पूर्व ही कोई पूजा अर्चना कर दिया करता है।
अंग्रेजों ने बनवाया था बंगला
सदियों तक मानव पहुंच से बाहर रहे इस क्षेत्र में ब्रिटिश शासन काल में अंग्रेजों के शिकारी प्रवृति ने इस बीहड़ पहाड़ी पर एक बंगला का निर्माण किया। यहां शिकार खेलने जाने को इच्छुक अंग्रेज रात्रि में अपना पड़ाव डालते थे। आज यहां एसएसबी की एक टुकड़ी रहती है। इन पर श्रद्धालुओं और पूरे इलाके की सुरक्षा का भार है। 1990 में सबसे पहले आस-पास के लोगों ने सोमेश्वर की पहाड़ी पर नवाह परायण यज्ञ का आयोजन किया था। इसके बाद लोगों की श्रद्धा भक्ति मां कालिका के प्रति दृढ़ होने लगी और आज प्रतिदिन हजारों की संख्या में दूर-दूर से श्रद्धालुओं का आना होता है।
बिहड़ पहाड़ियों के बीच स्थित है कई ऐतिहासिक व पौराणिक धरोहर
उत्तर की ओर ऊंची हो रही बिहड़ सात पहाड़ियों के बीच ऐतिहासिक धरोहर में राजा भतृहरि का कुटी, रासोगुरु का पत्थर का नाव, सोमेश्वर महादेव का मंदिर, कलकल करते झरने, कभी न सुखने वाला अमृत कुंड, भर्तृहरि गुफा एवं सोमेश्वर की सबसे ऊंची चोटी पर स्थित मां कालिका का पर्वत फाड़कर निकला हुआ कंगन सहित हाथ और उसके बगल में निर्मित एक छोटा सा मंदिर जो अब आस्था का प्रतीक बन चुका है।
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