पटना. पूर्व उपमुख्यमंत्री
सुशील कुमार मोदी ने कहा कि मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी ने लंदन स्कूल आॅफ इकोनाॅमिक्स में दिए अपने भाषण में राजनीतिक ईमानदारी का परिचय नहीं दिया। वहां बिहार के विकास की जो उपलब्धियां उन्होंने गिनाईं, इसके साथ ही उन्हें यह बताना चाहिए था कि ये उपलब्धियां तब की हैं जब भाजपा और जदयू की मिली जुली सरकार थी। जिस नीतीश कुमार को विकास पुरुष बता कर मुख्यमंत्री ने ढोल पीटा, उन्हें यह भी बताना चाहिए कि भाजपा से गठबंधन टूटने के बाद के एक साल के उनके कार्यकाल में बिहार कैसे विकास से बेपटरी हो गया?
नीतीश कुमार को बिहार के विकास के प्रणेता बताने वाले मुख्यमंत्री को यह भी बताना चाहिए कि भाजपा से गठबंधन टूटने के बाद वर्ष 2013-14 में बिहार की विकास दर आधी क्यों हो गई? योजना आकार में दस गुना वृद्धि, विधि-व्यवस्था दुरूस्त करने की कार्रवाई, साइकिल योजना, पंचायतों में आरक्षण आदि की दिशा में किए गए तमाम प्रयास तब के हैं, जब भाजपा भी सरकार में थी। इन सारे प्रयासों में भाजपा के मंत्रियों का भी बराबर का योगदान है। मुख्यमंत्री को यह बताना चाहिए कि भाजपा से गठबंधन टूटने के बाद के सवा साल में इन सभी क्षेत्रों में सरकार की क्या उपलब्धियां रहीं हैं?
मुख्यमंत्री को बताना चाहिए था कि किस तरह से राजनीतिक मजबूरी में नीतीश कुमार ने सुशासन और विकास को पीछे धकेल कर उस लालू प्रसाद से हाथ मिला लिया, जिनके 15 वर्षों के लम्बे शासनकाल में बिहार के लोग अपनी पहचान बताने में शर्म महसूस करते थे। आज मुख्यमंत्री की कुर्सी उसी लालू प्रसाद के समर्थन पर टिकी हुई है, जिनके शासनकाल को ‘जंगल राज’ तक कहा गया था।
मुख्यमंत्री ने जो विकास की कथा सुनाई है, वह एकल जदयू की नहीं बल्कि भाजपा के प्रयासों का भी प्रतिफल है। मुख्यमंत्री को राजनीतिक ईमानदारी दिखाते हुए भाजपा के सरकार से अलग होने के बाद की चर्चा भी करनी चाहिए थी। ऐसा न करके जहां उन्होंने ईमानदारी से मुंह मोड़ा है वहीं बिहार की जनता के साथ भी छल किया है।