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डीएमसीएच की दीवारें जर्जर, खतरे में लोगों की जान

8 वर्ष पहले
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दरभंगा. 32 वर्षों में दरभंगा मेडिकल कॉलेज अस्पताल का ललित नारायण मिश्र शल्य चिकित्सा भवन ऐसी स्थिति में पहुंच चुका है, कि वह कभी भी ध्वस्त हो सकता है। आठ सौ खम्भों वाले इस भवन में कई दरारें पड़ चुकी हैं। इसे देख अस्पताल प्रशासन, मरीज व परिजन आतंकित रहते हैं। भूकम्प के हाई रिस्क जोन वाले इस जिले में अगर हल्का झटका भी आता है, तो अनिष्ट हो सकता है।

12 अप्रैल 1982 को तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. जगन्नाथ मिश्र ने डीएमसीएच परिसर में आर्थोपेडिक्स एवं सर्जरी के मरीजों के लिए 372 शय्या, सीसीडब्लू की 44 शय्या व सशुल्क 48 शय्या वाले भवन का उद्घाटन किया था। लगभग हजार से ज्यादा लोग हर वक्त मौजूद रहते हैं।

95 लाख का आवंटन मिला, पर एनओसी नहीं

भवन निर्माण विभाग के जूनियर इंजीनियर सुरेश राम की मानें, तो ललित नारायण मिश्रा शल्य चिकित्सा भवन को विभाग ने चार ब्लॉकों में बांटकर तीन करोड़ 95 लाख का प्राक्कलन बनाकर स्वास्थ्य विभाग को भेज दिया है, जिसमें से पूर्वी ब्लाक के लिए 95 लाख का आवंटन भी मिल चुका है, किंतु स्वास्थ्य विभाग पटना के द्वारा एनओसी प्राप्त नहीं होने के कारण काम शुरू नहीं करवाया जा सका है।

न मरीज सुरक्षित, न उनके परिजन
जब घर से अस्पताल आने का वक्त होता है, तो खुद के साथ साथ परिजनों को भी भय बना रहता है, जब तक शाम को घर नहीं पहुंचते।

संजय कुमार,लैब इंचार्ज
भवन की हालत और पसरी गंदगी के कारण यहां एक पल रहने को इच्छा नहीं होती। अस्पताल से छुट्टी मिल जाए, वही अच्छा।
सुचित्रा देवी, मरीजक्या करें! अफसर ही हैं बेफिक्र॥भवन किसी भी स्थिति में रहने योग्य नहीं है, फिर भी भवन में जान हथेली पर रखकर सात से आठ सौ मरीज एवं उनके परिजन, चालीस से पचास डॉक्टर व पचास के आस-पास सफाई कर्मी तथा अन्य कर्मी रहते है। भवन विभाग और स्वास्थ्य विभाग को इस भवन के संबंध में लिखा जा चुका है, अभी तक कुछ निर्देश प्राप्त नहीं हुआ है। उन्हें खुद भी यह चिंता रहती है, कि कहीं कोई बड़ा हादसा न हो जाय।

डॉ. एस. एन. सिन्हा, प्राचार्य सह अस्पताल अधीक्षक
डर के कारण भवन के अंदर नहीं जाते हैं। ज्यादा जरूरत पडऩे पर जान जोखिम में रखकर ही अस्पताल के अंदर जाते हैं। यहां ड्यूटी करना जान पर खेलना है। अधिकारियों को तो इसकी परवाह ही नहीं हैं।
बरुण कुमार झा,सुरक्षाकर्मी