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लालू की बर्बादी के पीछे हाथ है 95 साल के इस शख्स का, पढ़ें क्या कहा!

इस शख्स ने तबाह कर दी लालू का पोलिटिकल करियर, पढ़ें क्या कहा!

Danik Bhaskar

Oct 01, 2013, 12:25 PM IST
रांची/पटना। चारा घोटाले में फंसे बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद के खिलाफ अभियोजन की स्वीकृति देने वाले बिहार के तत्कालीन गवर्नर एआर किदवई का कहना है कि जब नेता ही बिक जाएंगे, तो देश कैसे चलेगा। जिनके हाथ में पावर जाती है, वे ही इसका दुरुपयोग करने लगते हैं। चारा घोटाला इसका उदाहरण है। सीबीआई के सबूतों पर मैंने लालू प्रसाद खिलाफ अभियोजन की स्वीकृति दी।
पढ़ें, एआर किदवई से खास बातचीत के प्रमुख अंश
सवाल : क्या कैबिनेट की मंजूरी के बिना आपने अभियोजन की स्वीकृति दी?
जवाब : ऐसी बात नहीं है। गवर्नर का क्या अधिकार होता है, मैं अच्छी तरह जानता हूं। बिहार, पश्चिम बंगाल, हरियाणा और राजस्थान में मैं 17 साल तक गवर्नर रहा। ऐसे मामलों में डिसीजन लेने के लिए गवर्नर स्वतंत्र हैं। जब कैबिनेट के लोग ही आरोपी हैं, तो उनसे स्वीकृति लेने की जरूरत नहीं थी।
सवाल : मुकदमा अंतिम मुकाम तक पहुंच गया है। आपको कैसा लग रहा है?
जवाब : 17 साल पुराने मामले में अब तक फैसला नहीं आना, चौंकाने वाला है। खैर देर आए, दुरुस्त आए वाली कहावत भी चरितार्थ हो, तो अच्छा है। दोषियों को सजा मिलनी ही चाहिए।
सवाल : लालू प्रसाद और अन्य आरोपियों से अब आपके संबंध कैसे हैं?
जवाब : लालू प्रसाद से काफी दिनों से मुलाकात नहीं हुई है। मेरी भी उम्र 95 साल हो गई है। दिल्ली में रह रहा हूं। लालू जब जेल गए, तब मैंने ही उनकी पत्नी को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाई थी।
सवाल : पशुओं का चारा खा जाने वाला यह मामला आपकी नजर में कितना संगीन है?
जवाब : उस समय का यह सबसे बड़ा घोटाला था। तब झारखंड नहीं बना था, लेकिन इस क्षेत्र को बिहार के नेताओं, अफसरों और सप्लायरों ने चारागाह बना रखा था। इनके गठजोड़ से ही इतने बड़े घोटाले को अंजाम दिया गया।
आगे की स्लाइड्स में पढ़ें केस दर्ज करने वाले अमित खरे ने क्या कहा...
लोग कहते थे कुछ नहीं होगा, पर नतीजे आए
 
रांची। घोटाले की पहली प्राथमिकी दर्ज कराने वाले चाईबासा के तत्कालीन उपायुक्त अमित खरे का कहना है कि जीत न्याय की ही होती है। जिन लोगों ने फर्जी ढंग से सरकारी खजाने से अरबों रुपए निकाले, वे जेल में हैं। जब उन्होंने एफआईआर दर्ज कराई थी, तो साथी कहते थे कि कोई नतीजा नहीं निकलेगा। नतीजा सामने आया और वह भी सुखद।
 
खरे ने बताया कि बिहार के तत्कालीन अपर वित्त आयुक्त एस विजय राघवन ने जनवरी 1996 में पशुपालन विभाग से निकाली गई राशि के बारे में पूछा था। जांच में पाया कि नवंबर 1995 में 10 करोड़ और दिसंबर में नौ करोड़ की निकासी हुई है। यह आवंटन से काफी अधिक था। मुझे लगा जोड़-घटाव में कुछ गड़बड़ी हो रही है। पुन: बिलों को चेक किया, तो पता चला कि यहां फर्जी ढंग से पैसे निकाले जा रहे हैं। तुरंत विभाग के दफ्तर गया। अफसर ऑफिस छोड़ कर भाग गए। मैंने विभाग का दफ्तर सील करा दिया, ताकि कोई कागजात इधर-उधर नहीं कर सके। फिर प्राथमिकी की।
 
अंतत: मामला सीबीआई के पास पहुंचा। गहन जांच-पड़ताल हुई। कई मामलों में दोषी लोगों को सजा सुनाई गई। अब बड़े राजनीतिज्ञों का मामला है। न्याय की जीत होने पर हर किसी को खुशी मिलती ही है।
सजा के बाद: सीबीआई कोर्ट की टिप्पणी
 
धर्मो रक्षति धर्म
 
धर्मो रक्षति धर्म यानि धर्म करने वालों कीही धर्म रक्षा करता है। (फैसला सुनाने के दौरान जज ने भ्रष्टाचार कानून के बारे में बताया और ये बातें कहीं।)
प्रवास कुमार सिंह, सीबीआई कोर्ट के विशेष जज
 
मोदी की लड़ाई खत्म : जो बोया, वही काटा
 
लालू प्रसाद ने जो बोया, वो ही काट रहे हैं। भाजपा ने घोटाला उजागर होने पर मामले को प्रमुखता से उठाया था। लालू के दोषी करार होते ही लड़ाई खत्म हुई। सुशील मोदी, भाजपा विधायक, बिहार
 
सीबीआई की मेहनत रंग लाई: साक्ष्य पुख्ता थे, सजा हुई  
 
साक्ष्य पुख्ता थे। ओरल और डॉक्यूमेंट्री प्रूफ भी काफी मजबूत था। सीबीआई को पहले से भरोसा था कि इन आरोपियों को सजा मिलेगी ही।  
बीएमपी सिंह, सीबीआई के वकील
 
राजद के लिए संकट की घड़ी: पार्टी हताश है, निराश नहीं
 
राजद के लिए संकट की घड़ी है। इस फैसले से कार्यकर्ता निराश हैं, हताश नहीं। पार्टी अपनी नीतियों के तहत हमेशा की तरह काम करती रहेगी।
रघुवंश प्रसाद सिंह, राजद सांसद 
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