(ललित नारायण मिश्रा- फाइल फोटो)
पटना. यह 20 जनवरी, 1975 का दस्तावेज है। देखिए, पढ़िए। डॉ. जगन्नाथ मिश्रा, जो ललित नारायण मिश्रा के छोटे भाई हैं और जो ग्रेनेड के हमले में खुद घायल भी हुए थे, ने अपने कलमबंद बयान में कहा है-‘क्षतिग्रस्त किडनी लिए ललित बाबू चिल्लाते रह गए किंतु उत्तर-पूर्व रेलवे का चीफ मेडिकल अफसर डॉ. भल्ला ने नोटिस नहीं ली। वह उनके खिलाफ मानसिकता रखे था। घायल ललित बाबू को लेकर उनका सैलून समस्तीपुर से दो घंटे देर से दानापुर को चला। दुनिया छोड़ने से पहले ललित बाबू ने मुझसे कहा था कि यह बड़े लोगों का षड्यंत्र हो सकता है।’
सीबीआई की जांच इस रास्ते पर चली? नहीं, तो क्यों? उसने आनंदमार्गियों को आरोपी बनाया। चार आनंदमार्गी दोषी माने गये हैं। कौन सही है- डॉ. मिश्रा, ललित बाबू के पुत्र विजय मिश्रा या सीबीआई या फिर दूसरे परिस्थितिजन्य साक्ष्य? बहरहाल, 39 साल के दौरान यहां के सिस्टम ने देश में आम आदमी की बिसात बता दी है। वाकई, जो देश इतने साल में भी अपने खास किरदार के हत्यारों को अंतिम सजा न दिला सके, उसे क्या कहा जाएगा? यही रिकॉर्ड देरी उस ढेर सारी आशंकाओं के मूल में है, जिसे सिरे से खारिज नहीं किया जा सकता है।
इसमें कुछ बड़ों को बचाने के लिए जांच को सीधे मोड़ देने तक की बातें शामिल हैं। देश की सर्वोच्च जांच एजेंसी सीबीआई पर खूब अंगुलियां उठीं। हालांकि, वह इसे नकारती रही।
डॉ. मिश्रा सीबीआई के जांच निष्कर्ष को कभी नहीं माने। इधर, उन्होंने जिला एवं सत्र न्यायाधीश (तीस हजारी, दिल्ली) एस.एन. ढिंगरा की अदालत में गवाही के दौरान भी कहा, ‘मैं सीबीआई की इस राय से कदापि सहमत नहीं हूं कि आनंदमार्गियों ने मेरे भाई की हत्या की।’
जरा यह भी देखिए। दुनिया को हिला देने वाला यह कांड जहां (समस्तीपुर) हुआ, तब वहां के एसपी डीपी ओझा थे। उनके अनुसार जब तक बिहार की पुलिस और सीआईडी जांच करती रही या जांच में सीबीआई को मदद करती रही, तब तक जांच के दायरे में आनंदमार्गी नहीं आए थे। तो क्या राज्य पुलिस व सीआईडी की जांच ही गलत थी? आनंदमार्गी कहां से आ गए? अरुण कुमार मिश्र और अरुण कुमार ठाकुर कैसे और क्यों इस जघन्य कांड से बाहर कर दिए गए? दोनों को पकड़कर कोर्ट में पेश किया गया था। साथ में सीबीआई भी थी। आखिर एक-दूसरे को काटने वाली जांच के क्या निष्कर्ष निकलते? नतीजे के तौर पर सबकुछ सामने हैं।
अप्रैल, 1975 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने मुख्यमंत्री अब्दुल गफूर को हटा दिया। डॉ. जगन्नाथ मिश्रा मुख्यमंत्री बने। यह लगभग वही दौर था, जब सीबीआई इस मामले को अपने हाथ में ले चुकी थी। जांच के केंद्र में आनंदमार्गी आ चुके थे। संतोषानंद, अर्थेसानंद, सुदेवानंद, गोपाल जी, रंजन द्विवेदी, विनयानंद, राम कुमार व रामाश्रय को आरोपी बनाया गया। राम कुमार, रामाश्रय व विनयानंद भगोड़ा घोषित रहे। अर्थेसानंद अब इस दुनिया में नहीं हैं।
सीबीआई की माने तो आनंदमार्गियों ने अपने प्रमुख प्रभात रंजन सरकार को छुड़ाने को सरकार पर दबाव बनाने को इस हत्याकांड को अंजाम दिया। डॉ.जगन्नाथ मिश्रा ने डीपी ओझा पर कार्रवाई की। बाद में कर्पूरी ठाकुर की सरकार ने उनको दोषमुक्त किया। मजे की राजनीति। बड़ी लंबी दास्तान है। जिंदा सवाल, धधक गए हैं। कभी मिलेगा इनका जवाब?
40 साल …, सब कुछ खुलेआम-बेनकाब
2 जनवरी, 1975 : समस्तीपुर जंक्शन पर रेलवे के समारोह में रेलमंत्री ललित नारायण मिश्रा पर ग्रेनेड से हमला, समस्तीपुर पुलिस ने अज्ञात लोगों पर मुकदमा दर्ज किया
3 जनवरी, 1975 : दानापुर रेलवे अस्पताल में मौत
3 जनवरी : सीआईडी जांच शुरू
7 जनवरी : सीबीआई ने मामला दर्ज किया।
24 नवंबर : पटना में विशेष न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत में सभी अभियुक्तों के खिलाफ चार्जशीट। यहां चार साल तक मामला चला।
मई, 1977 : मैथ्यू आयोग का गठन। जांच के बिंदु रहे-मौत के कारण के तौर पर चिकित्सा चूक व मौके पर सुरक्षा की स्थिति।
मामले की सुनवाई में बाधा न पहुंचे, फेयर ट्रायल हो, ऐसे तर्कों पर इस मामले को दूसरी जगह ट्रांसफर करने की बात सीबीआई ने उठाई।
1978 : केंद्र में जनता पार्टी और बिहार में कर्पूरी ठाकुर की सरकार ने सीबीआई की विश्वसनीयता व निष्पक्षता पर सवाल उठाया।
17 दिसंबर, 1979 : सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की सुनवाई दिल्ली की अदालत में कराने का निर्देश दिया। दिल्ली पहुंचा मामला।
ख्याति प्राप्त न्यायविद वीएम तारकुंडे की इस पर आपत्ति कि सीबीआई इस मामले में निदोर्षों
को फंसा रही है।
जनवरी, 1981 : अभियुक्तों के खिलाफ आरोप तय करने को मामले को ट्रायल के लिए अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश के
पास भेजा गया।
17 अगस्त, 2012 : सुप्रीम
कोर्ट ने कहा-इस आधार पर निरस्त नहीं होगा यह मामला कि सुनवाई में 37 वर्ष गुजर गए।
12 सितंबर, 2014 : कड़कड़डूमा, नई दिल्ली की अदालत के जिला न्यायाधीश विनोद गोयल ने मुकदमे की सुनवाई पूरी की। 12 नवंबर को फैसला सुनाने की बात कही।
12 नवंबर : बोले विजय गोयल- आठ दिसंबर को आएगा फैसला।
8 दिसंबर : चार आरोपी दोषी करार दिए गए।
15 दिसंबर : सजा सुनाई जाएगी।
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