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डाउनलोड करेंरांची. बच्चों के रेडी टू ईट पोषाहार के लिए समाज कल्याण विभाग द्वारा निकाला गया टेंडर सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन का उल्लंघन है। गाइडलाइन के मुताबिक, राज्य सरकार बिना सुप्रीम कोर्ट की अनुमति के टेंडर नहीं निकाल सकती है। जबकि, विभाग ने बगैर अनुमति के ही टेंडर निकाला। राज्य के वित्त विभाग ने भी समाज कल्याण के इस प्रस्ताव का कई बार विरोध किया था।
2011 में वित्त विभाग ने समाज कल्याण को लिखा था कि सुप्रीम कोर्ट ने पोषाहार आपूर्ति की केंद्रीकृत व्यवस्था करने और टेंडर निकालने पर रोक लगा रखी है। ऐसे में टेंडर से पहले विभाग सुप्रीम कोर्ट से अनुमति ले। फिर इस पर विचार किया जाना सही होगा। वित्त विभाग की आपत्ति के बावजूद समाज कल्याण ने प्रस्ताव तैयार कर नई व्यवस्था के लिए कैबिनेट से मंजूरी ले ली। 2003 में तत्कालीन समाज कल्याण सचिव यूके संगमा ने अनुमति के लिए सुप्रीम कोर्ट में आवेदन दिया था। लेकिन, राज्य सरकार ने उस पर आगे की कार्रवाई नहीं की।
अधिकांश राज्यों में बगैर टेंडर काम
अधिकांश राज्यों में सुप्रीम कोर्ट के गाइडलाइन के मुताबिक बगैर टेंडर का पोषाहार आपूर्ति हो रहा है। मध्यप्रदेश में राज्य एग्रो इंडस्ट्रीज विकास निगम के द्वारा आपूर्ति होती है। राजस्थान में एडहॉक व्यवस्था तो महाराष्ट्र में केवल महिला मंडल स्वयं सहायता समूह को ही टेंडर में भाग लेने की अनुमति है। उत्तर प्रदेश और गुजरात में टेंडर हुआ लेकिन विवाद भी साथ-साथ चल रहा है।
निगरानी के लिए कमिश्नर
सुप्रीम कोर्ट ने भोजन के अधिकार मामले में चल रहे केस को लेकर कमिश्नर और सलाहकार को बहाल किया है। योजनाओं की निगरानी और सुप्रीम कोर्ट को इसके क्रियान्वयन से अवगत कराना इनकी जिम्मेदारी है। कोर्ट का सभी राज्यों को स्पष्ट निर्देश है कि योजना पर वे जो भी निर्णय लें और मीटिंग करें, उनमें सलाहकार को भी शामिल करें। झारखंड में निगरानी के लिए बलराम को जिम्मेदारी सौंपी गई है।
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