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बस सांसें चल रहीं, आंखें उसका इंतजार कर रही हैं

8 वर्ष पहले
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पटना. माता-पिता की जिंदगी में वह बेहद खुशी का क्षण होता है जब उसकी संतान पहली बार दुनिया में कदम रखती है। पिंकी के जीवन में भी वह क्षण आया जब 31 दिसंबर की देर रात करीब 2 बजे उसने एक नन्हें बाल गोपाल को जन्म दिया, लेकिन 9 महीनों तक हर पल जिस अंश को उसने अपनी कोख में रखा उसे 9 घंटे भी दुलार ना सकी।
जन्म के तीन घंटे बाद, करीब 5 बजे उसके चेहरे पर मुस्कुराहट की जगह गुस्सा दिख रहा था, जब उसे पता चला कि उसके अंश को कोई चुरा ले गया है। खुशी की वह नमी गम के आंसुओं में बदल गई। वह कभी डॉक्टर के पास जाती, कभी नर्स, कंपाउंडर तो कभी अस्पताल में मौजूद अन्य लोगों के पास और सभी से एक ही सवाल पूछती- मेरा बच्चा कहां है? एक ही गुहार लगाती- मुझे मेरा बच्चा लाकर दे दो। मां अपने बच्चे के लिए दो बार मुख्यमंत्री के जनता दरबार में गई लेकिन दोनों बार पति-पत्ती को खाली हाथ ही वहां से लौटना पड़ा।
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