पटना/नई दिल्ली. बिहार में राजनीतिक घटनाक्रम तेजी से बदल रहा है। मांझी के समर्थक मंत्री और विधायकों पर जदयू की एक
महिला विधायक को धमकी देने का आरोप लगा है। मांझी सरकार में मंत्री रहीं बीमा भारती ने आरोप लगाया है कि उन्हें मांझी को समर्थन देने के लिए मांझी के करीबी मंत्री विनय बिहारी और सुमित सिंह द्वारा धमकाया जा रहा है। सचिवालय थाने में बीमा भारती ने मंत्रियों के खिलाफ लिखित शिकायत दर्ज कराई है। इस बीच, नीति आयोग की बैठक में हिस्सा लेने दिल्ली पहुंचे बिहार के सीएम जीतन राम मांझी ने
रविवार शाम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की। जेडीयू नेता केसी त्यागी ने मांझी के नीति आयोग की बैठक में शामिल होने पर ही सवाल खड़े किए । त्यागी ने कहा कि जब मांझी के पास विधानसभा में बहुमत ही नहीं है तो मांझी का नीति आयोग की बैठक में शामिल होना असंवैधानिक है।
सरकार बनाने का दावा
उधर, रविवार को
नीतीश कुमार के समर्थक नेता जेडीयू प्रदेश अध्यक्ष वशिष्ठ नारायण सिंह की अगुआई में राजभवन पहुंचे। वशिष्ठ नारायण सिंह ने राज्यपाल के मुख्य सचिव को एक चिट्ठी सौंपी, जिसमें बताया गया है कि जीतन राम मांझी को पार्टी के नेता के पद से हटा दिया गया है और नीतीश कुमार को विधायक दल का नया नेता चुना गया है। इसके अलावा, नई सरकार बनाने का दावा पेश करते हुए अामंत्रित किए जाने की अपील भी की गई है। वशिष्ठ नारायण सिंह के साथ विजय चौधरी, आर सी पी सिंह और राजद नेता अब्दुल बारी सिद्दिकी के अलावा कांग्रेस और सीपीआई के नेता भी थे। बता दें कि फिलहाल बिहार के राज्यपाल केसरीनाथ त्रिपाठी पटना में नहीं हैं। नीतीश कुमार ने सोमवार को राज्यपाल से मिलने के लिए वक्त मांगा है। दूसरी ओर, बिहार विधानसभा स्पीकर ने भी नीतीश को विधायक दल के नेता के तौर पर मान्यता दे दी है।
मांझी के फैसले की वैधानिकता पर उठे सवाल
बिहार में कैबिनेट में ज्यादातर मंत्रियों के मांझी के विरोध में आगे आने के बाद मुख्यमंत्री के फैसलों की वैधानिकता पर सवाल खड़े हो गए हैं। संविधान के जानकार कह रहे हैं कि मुख्यमंत्री की सिफारिशों को मानने के लिए राज्यपाल बाध्य नहीं हैं क्योंकि कैबिनेट में ज्यादातर मंत्री मांझी का विरोध कर रहे हैं। पूर्व अटॉर्नी जनरल सोली सोराबजी के मुताबकि, कैबिनेट के ज्यादातर सदस्यों का फैसला ही टिकेगा क्योंकि सीएम की ओर से भेजी गई सिफारिशों को बहुत कम मंत्रियों का समर्थन हासिल है। सीनियर वकील अमरेंद्र शरण ने कहा, 'राज्यपाल ऐसी किसी सिफारिश को मानने के लिए बाध्य नहीं हैं, जिसे कैबिनेट के ज्यादातर सदस्यों का समर्थन न हासिल हो।'
मंत्रियों के इस्तीफे
नीतीश के कड़े तेवर से नाराज मांझी ने नीतीश खेमे के 15 मंत्रियों को बर्खास्त करने की सिफारिश कर दी है। वहीं, नीतीश समर्थक माने जाने वाले 20 मंत्रियों ने खुद इस्तीफा दे दिया है। इन इस्तीफों पर अब राज्यपाल केसरीनाथ त्रिपाठी को फैसला लेना है। वे सोमवार या मंगलवार तक लौटेंगे। राज्यपाल ने
पीके शाही और ललन सिंह को बर्खास्त करने की सिफारिश पहले ही मंजूर कर ली है।
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क्या विधानसभा भंग होगी?
शायद हां। क्योंकि कैबिनेट ने विधानसभा भंग करने का प्रस्ताव रखा। राज्यपाल सीएम की अगुआई वाले कैबिनेट का फैसला मानने को बाध्य हैं। पर ऐसा हुआ तो नीतीश के पक्ष में सहानुभूति पैदा हो सकती है। इसलिए शायद केंद्र सरकार ऐसा न होने दे।
सीएम के साथ तो 7 ही मंत्री थे?
तो क्या हुआ? कैबिनेट के फैसले अल्पमत या बहुमत के नहीं होते। बैठक में सीएम की ओर से दिया जाने वाला प्रस्ताव कैबिनेट का ही माना जाता है।
नीतीश सरकार बनाने का दावा पेश करें तो?
कर सकते हैं। लेकिन बहुमत किसके पास है, इसका फैसला विधानसभा में ही होगा। संभव है राज्यपाल मांझी को बहुमत साबित करने को कहें।
वे ऐसा न कर पाए तो नीतीश को मौका मिल जाए। फायदा किसे?
फिलहाल तो भाजपा को। वह चुनाव में नीतीश के सत्ता के लालच और दलित के अपमान को मुद्दा बनाएगी।
तो नीतीश ने ऐसा क्यों किया?
अब मोदी लहर नहीं है।
दिल्ली चुनाव में ये साफ दिखा। नीतीश अवसर देख रहे हैं। मांझी के भरोसे वे चुनाव नहीं जीत सकते थे। इसलिए दांव चला है।
मांझी का क्या होगा?
भाजपा की चाल में फंसे। शायद भाजपा ने भरोसा दिया हो सरकार गिर जाए तो हमारी पार्टी में आ जाना। वहां वैसा सम्मान न मिला तो कहीं के नहीं रहेंगे।
अब आगे क्या
जेडीयू
1. राज्यपाल के समक्ष विधायकों की परेड भी संभव। राष्ट्रपति से भी लगा सकते हैं गुहार।
2. विधानसभा भंग किया तो कोर्ट भी जा सकते हैं।
मांझी
1. मांझी विधानसभा भंग करने की सिफारिश कर सकते हैं।
2. राज्यपाल उन्हें चुनाव तक कार्यवाहक सीएम रख सकते हैं।
3. भाजपा के सहयोग से विधानसभा में बहुमत भी साबित कर सकते हैं।
बिहार विधानसभा की स्थिति
कुल सीटें-243
111 जेडीयू
91 भाजपा
24 आरजेडी
05 कांग्रेस
02 अन्य
10 खाली
-नीतीश के साथ जेडीयू के 104 विधायक।
-मांझी के साथ सिर्फ 7 यानी मांझी अल्पमत में।
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