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मृत बेटे की इच्छा पूरी करने आते हैं हुकुमचंद्र, जानिए क्या लाभ हुआ हैं इन्हें

7 वर्ष पहले
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(फोटो- हुकुमचंद्र अपनी पत्नी के साथ)
गया/पटना। आमतौर पर गया में लोग अपने पितरों यानी पूर्वजों का पिंडदान करने आते हैं पर राजस्थान के हुकुमचंद अग्रवाल यहां पिछले 40 साल से अपने पुत्र का पिंडदान करते हैं। 1973 से वे लगातार आ रहे हैं। बीच में दो साल तबीयत खराब होने के कारण वे नहीं आ सके थे। वे हर साल अपनी पत्नी सावित्री अग्रवाल के साथ यहां पांच दिन के लिए आते हैं।

जयपुर में गुड़ व खंडसारी के व्यापार करने वाले हुकुमचंद को 1970 में पुत्र की प्राप्ति हुई थी। वह उनका बड़ा बेटा था। दो साल बाद अचानक उनके बड़े बेटे की मौत हो गई। बेटे की मौत के पहले उनके एक भाई की मौत हो गई। उनके पुरोहितों ने उन्हें सुझाव दिया कि इन सबों का गया श्राद्ध कर प्रेतबाधा की मुक्ति इन्हें दिलाएं।
हुकुमचंद कहते हैं कि हमने ब्राह्मणों का सलाह मानी और गया पिंडदान करने आ गए। वे कहते हैं कि जैसे ही मैं पिंडदान करने के लिए जाने लगा तभी हमें अहसास हुआ कि मेरा भाई और मेरा बेटा मेरे सामने खड़ा है। उसने हमसे कहा कि हमें अपने साथ रखिए।
हम आप सबों को तंग नहीं करेंगे। हम परिवार के साथ ही रहना चाहते हैं। उन दोनो ने हमें कहा कि आप हर साल आकर गया जी मे तर्पण करेंगे। तब से लगातार आ रहा हूं। समझिए उस दिन से हमारे परिवार को सुख ही सुख है।
वे कहते हैं कि हमने बेटे की याद में एक गोवर्धन में एक धर्मशाला भी बनवाया है। हुकुमचंद जी के दो बेटे और एक बेटी है। इन पांच दिनों में हुकुमचंद गया में गरीबों के बीच ढेर सारी सामग्रियां भी बाटंते हैं।