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इस जाड़े ड्राइवरों के विवेक से ही चलेंगी ट्रेनें, एसीडी का प्रयोग अभी नहीं

7 वर्ष पहले
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पटना। कोंकण रेलवे से सीख लेकर पूर्व-मध्य रेलवे एंटी कोलेजन डिवाइस के साथ जीपीएस सिस्टम का इस्तेमाल करने की तैयारी में है। लेकिन, इस सीजन में इसके लगने की संभव नहीं है। हालांकि, रेलवे ने ट्रेनों की स्पीड 60 किमी प्रतिघंटा निर्धारित कर दी है। सिग्नल के पास लगे पुराने बल्ब बदल कर एलईडी लाइट लगा दी है और फॉग मैन की तैनाती भी कर दी है। इसके बाद सब ड्राइवरों के विवेक पर छोड़ दिया है। वह कोहरे के दौरान ट्रेनों की स्पीड को और घटा सकता है। यानी इस जाड़े में ट्रेनों की चाल व सुरक्षा चालकों के विवेक पर है।
क्या है एंटी कोलेजन डिवाइस
एंटी कोलेजन डिवाइस (एसीडी) कोंकण रेलवे ने विकसित किया है। यह सिस्टम ट्रेन व सिग्नल के बीच के कोहरे को चीर देता है। इससे दो किमी दूर से ही ट्रेन के ड्राइवर को सिग्नल दिखने लगता है। एसीडी डिवाइस यूएचएफ अल्ट्रा हाई फ्रिक्वेंसी की तरंगों को छोड़ने की तकनीक पर आधारित है। इसे ट्रेन के इंजन में, गार्ड के केबिन, आॅनलाइन लेबल क्रासिंग, कंट्रोल और स्टेशन मास्टर, आउटर के सिग्नल केबिन पर लगा दिया जाता है। ट्रेन के ट्रैक पर गुजरने के दौरान इसकी तंरगों को ग्लोबल पोजीशनिंग सिस्टम (जीपीएस) के जरिए दूसरा एसीडी पकड़ लेता है। सही लोकेशन की जानकारी होने से ट्रैक पर हादसे की आशंका कम हो जाती है।
पीजी लाइन में पटाखे का इस्तेमाल

पीजी लाइन जैसे पटना-गया और राजगीर रूट पर कोहरे के दौरान पटाखे (डेटोनेटर) का इस्तेमाल होता है। दानापुर मंडल के मुख्य डिविजनल सेफ्टी ऑफिसर जीपी मंडल ने बताया कि हावड़ा-दिल्ली रूट पर डबल डिस्टेंस सिग्नल है, इसलिए इस पर पटाखे का इस्तेमाल नहीं होता।
275 मीटर पहले पहला डेटोनेटर : पीजी लाइन में सिग्नल से 275 मीटर पहले पहला डेटोनेटर लगाया जाता है। फिर 10-10 मीटर के अंतराल पर डेटोनेटर लगाए जाते हैं। जैसे ही इंजन गुजरता है, डेटोनेटर फटता है और उस तेज आवाज से ड्राइवर को पता चल जाता है कि सिग्नल नजदीक है। इसके बाद वह ट्रेन की स्पीड कम कर देता है।