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डाउनलोड करेंपटना. बिहार में गठबंधन की राजनीति तेज हो गई है। मंगलवार को लालू प्रसाद ने कांग्रेस के सामने 24 सीटों की नई शर्त रखी तो बुधवार को रामविलास पासवान भी सक्रिय हो गए। बेटे चिराग के साथ कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से मिले। गठबंधन और सीट बंटवारे पर जल्द निर्णय करने को कहा। साथ ही 10 सीटों की शर्त भी रख दी।
लोजपा प्रमुख पासवान ने सोनिया गांधी को आगाह किया कि लालू प्रसाद से समझौता किया तो भ्रष्टाचार के मुद्दे पर कांग्रेस को नुकसान हो सकता है। कहा-उनकी पार्टी लालू से सीट बंटवारे पर बात नहीं करेगी। बेटे चिराग ने कहा-कांग्रेस लोजपा का गठबंधन पक्का है। अब कांग्रेस को तय करना है कि तीसरी पार्टी कौन होगी। पासवान ने कहा कि दस सीटों की सूची कांग्रेस के बिहार प्रभारी सीपी जोशी को सौंप दी है।
सम्मानजनक सीट मिलनी चाहिए-सूरजभान
लोजपा राष्ट्रीय महासचिव सूरजभान सिंह ने कहा कि गठबंधन किससे हो, इसका फैसला हमलोगों ने लोजपा अध्यक्ष पर छोड़ दिया है। कांग्रेस से पासवानजी की बात हो रही है। हमलोगों ने इतना स्पष्ट कर दिया है कि लोजपा को सम्मानजनक सीटें मिलनी चाहिए। 2009 में लोजपा को 12 सीटें मिली थी। इस बार दो की जगह तीन पार्टियां रहेंगी तो भी अधिकतम एक-दो सीटों पर पार्टी समझौता कर सकती है। साथ ही उन्होंने कहा कि मेरी पत्नी वीणा देवी चुनाव नहीं लड़ेंगी। उनकी जगह छोटा भाई चंदन चुनाव लड़ेगा।
सारा ड्रामा सीट बढ़वाने का, क्योंकि...
2009 में लालू-पासवान केंद्र में मंत्री रहते कांग्रेस से बिदक गए थे। कांग्रेस को पांच सीटें भी देने को तैयार नहीं थे। 28 सीटों पर राजद और 12 पर लोजपा लड़ी। कांग्रेस को अकेले लडऩा पड़ा। खमियाजा तीनों ने भुगता। राजद चार सीटों पर सिमट गई। लालू दो सीटों पर लड़े, एक ही जीते। पासवान के दल का खाता ही नहीं खुला। खुद भी हारे। कांग्रेस दो सीटें जीती।
लालू-पासवान दोनों को पता है कि इस बार के चुनाव में कांग्रेस के लिए उन्हें मुंहमांगी सीटें देनी होगी। कांग्रेस में चुनाव लडऩे वाले नेताओं की संख्या 12 से 15 है। इसलिए दोनों अपनी सीटें बढ़वाने की कोशिश कर रहे हैं। लालू अपने पुराने सहयोगी पासवान को चार से अधिक सीटें नहीं देना चाहते, जबकि रामविलास 8 से कम पर मानने वाले नहीं हैं।
नीतीश से भी करीबी दिखा रहे पासवान
लालू की 15 वर्षों की सत्ता ध्वस्त करने में रामविलास ने भी सक्रिय भूमिका निभाई थी। इसके कारण साथ आने के कारण लालू समर्थकों ने हाजीपुर में रामविलास को हरा दिया। हालांकि राजद ने ही पासवान को राज्यसभा पहुंचाया।
नरेंद्र मोदी के विरोध के कारण ही पासवान बिहार में पहले लालू के नजदीक गए। फिर नीतीश को सज्जन बताकर उनसे करीबी दिखा रहे हैं।
कल कांगे्रस की निंदा की थी, आज नीतीश जाएंगे सोनिया के कार्यक्रम में
यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी गुरुवार को किशनगंज में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (एएमयू) के सेंटर का शिलान्यास करेंगी। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी इस कार्यक्रम में शामिल होंगे।
शिलान्यास कार्यक्रम की सूचना राज्य सरकार को नहीं दिए जाने पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने एतराज जताया था। कहा था कि कैंपस के लिए राज्य सरकार ने दो साल पहले ही 224 एकड़ भूमि मुफ्त उपलध कराई थी। हमें ही न्योता नहीं मिला। कांग्रेस का यह रवैया संघीय ढांचे के खिलाफ है। इससे केंद्र-राज्य के संबंधों पर भी असर पड़ेगा।
शिक्षा मंत्री पीके शाही ने केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री पल्लम राजू को 27 जनवरी को पत्र भेज कर भी आपत्ति जताई थी। इसके बाद 28 जनवरी को मुख्यमंत्री और शिक्षा मंत्री पीके शाही को शिलान्यास कार्यक्रम में आने का निमंत्रण मिला।
राजनीति के दही का जोडऩ है लोजपा
बिहार की राजनीति में पासवान फैक्टर का अलग महत्व है। इसीलिए पासवान की लोजपा से तालमेल के लिए इस बार भी सब इच्छुक हैं। अभी कोई ठोस स्वरूप सामने नहीं आया है, इसलिए पासवान का राजनीतिक भाव बढ़ा हुआ है।
पासवान ने संकेत तो दे दिया है कि कांग्रेस के साथ उनका तालमेल होगा, पर अभी कई सीढिय़ां चढऩी हैं। फिलहाल कांग्रेस के साथ राजद को भी सम्मानजनक तालमेल करना बाकी है। राहुल गांधी भी चाहते हैं कि बिहार के कांग्रेसियों के सम्मान के विपरीत तालमेल न हो। आखिर सीटों की संख्या से सम्मान जुड़ा है।
पासवान का अपना छोटा ही सही, पर मजबूत जातीय वोट बैंक है जो उनके साथ ही रहता है। पासवान देश के उन थोड़े नेताओं में हैं जो अपने आधार-वोट को किसी भी दल की ओर मोड़ सकते हैं। 1999 के लोकसभा चुनाव में पासवान जब राजग के साथ थे तो बिहार में अधिकतर सीटें मिली थीं। जब पासवान 2004 में राजद के साथ हो गये तो ज्यादा सीटें राजद गठबंधन को मिल गईं। पासवान 2004 में भी राजग के साथ रहे होते तो लोकसभा में कांग्रेस की अपेक्षा भाजपा ही बड़ी पार्टी होती।
सच है कि पासवान का वोट बैंक इतना बड़ा नहीं है कि लोजपा सिर्फ उसी के बल पर कोई सीट जीत सके। पर राजनीति का दही जमाने के लिए किसी को भी लोजपा का 'जोडऩ चाहिए। इसी 'जोडऩ के लिए दूसरे दल पासवान की ओर मुखातिब रहते हैं। पासवान तालमेल में ज्यादा से ज्यादा सीटें लेकर कीमत वसूलना चाहते हैं पर अन्य दलों को वह कीमत अधिक लग रही है। राजद ने जिस तरह झारखंड में सहयोगी दलों को धमका कर राज्यसभा सीट छीनी, उससे अन्य दल भी प्रेरणा तो ले ही सकते हैं।
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