पटना। पूर्व सांसद शिवानंद तिवारी ने चुनावी राजनीति को पूरी तरह से अलविदा कह दिया है। उन्होंने भविष्य में अब कोई चुनाव नहीं लड़ने का फैसला किया है। अलबत्ता वे राजनीति को अलविदा नहीं करेंगे।
अब वे अपने राजनीतिक जीवन को संस्मरणों के माध्यम से लिपिबद्ध करेंगे और उसे कहानी की शक्ल देंगे। उन्होंने कहा कि जदयू से निष्कासन के बाद से मेरे राजनीतिक भविष्य को लेकर बहुत लोग मुझसे सवाल पूछते रहे हैं।मैं भी अपने भविष्य के विषय में स्पष्ट नहीं था।
तिवारी ने कहा कि 9 दिसंबर को मैं जीवन का 72 पूरा कर 73 वें वर्ष में प्रवेश करूंगा। काफी सोच-विचार कर मैंने तय किया है कि अब न कभी चुनाव लड़ूंगा और न किसी राजनीतिक दल में शामिल होऊंगा। लेकिन राजनीति से अलग नहीं रहूंगा।
72 साल लम्बा समय होता है। अपने जीवन में बहुत कुछ बदलते देखा है। मैंने तय किया है कि अपने संस्मरणों के जरिये इस बदलाव की कहानी लिखूंगा। जीवन का अधिकांश समय मैंने राजनीतिक कार्यकर्ता के रूप बिताया है। इस दौरान मैंने जो कुछ देखा, सुना और अनुभव किया है उसको ईमानदारी के साथ लिखने की कोशिश करूंगा।
फिलहाल भविष्य की यही योजना है। यूं समझदार बताते हैं कि जीवन की शुरुआत में भविष्य की योजना बना लेनी चाहिए। इससे जीवन में लय बना रहता है। लेकिन समझदारों की सलाह मानकर वैसी कोई योजना अपने जीवन की शुरुआत में मैंने नहीं बनाई। मेरी जिंदगी बहुत उबड़-खाबड़ या यूं कहें अराजक सी रही है।
काफी संघर्ष रहा है। लेकिन संघर्ष में कभी मैंने पीठ नहीं दिखाई। हमेशा आमने-सामने रहा। भविष्य को लेकर हमेशा बेपरवाह रहा हूं। जिंदगी में ज्यादातर फैसला लेने में मैंने दिमाग से ज्यादा दिल की बात मानी है। इस वजह से जो लोग जिंदगी को नफा-नुकसान की तराजू पर तौलते हैं, उनके मुताबिक मेरे हिस्से में नुकसान ज्यादा आया।
लोहिया विचार मंच और समता संगठन से हटने के बाद जब चुनाव की राजनीति में आया तो अब तक लालू और नीतीश के साथ ही रहा। इन दोनों के साथ बहुत पुराना रिश्ता रहा है। लालू से पचास-पचपन वर्षों का तो नीतीश से भी लगभग चालीस-बयालीस वर्षों से रिश्ता है। लेकिन आज इन दोनों से अलग हूं। या सच कहा जाय तो दोनों ने मुझे अपने से अलग कर दिया।
मैं उनकी परेशानी समझता हूं। आज की राजनीतिक संस्कृति के अनुसार मैं अपने को ढाल नहीं पाया, अतः इन दोनों के गले में अंटकता हूं। मुझे इस बात का खेद है कि दोनों ने अपने अहं की वजह से अपना नुकसान तो किया ही समाज को भी इनसे जितना मिल सकता था वह नहीं मिला।