पटना। बिहार में महिला तस्करी का नेटवर्क सीमांचल के जिलों में सघन रूप में फैल गया है। इस नेटवर्क में महिला दलाल तो हैं ही पुरूष दलाल गांव-गांव घूमकर पता लगाते हैं कि कहां से माल को उठाया जा सकता है। पुलिस और एनजीओ की चौकसी के बाद माल उठाने का तरीका भी बदल जाता है। पहले अररिया से लड़कियों की तस्करी खूब होती थी। अब यह पूर्णिया में शिफ्ट कर गया है।
नेपाल से सटे पूर्णिया, कटिहार, अररिया, सहरसा, सुपौल और सीतामढ़ी तक में तस्करों का जाल फैला हुआ है। अरब देशों के अलावा यूपी, हरियाणा, कोलकाता, मुंबई जैसे महानगरों में यहां से लड़कियों-महिलाओं को भेजा जाता है। उनकी कई बार खरीद-बिक्री होती है। अंतत: वे चकलाघरों में पहुंचा दी जाती हैं। बेटी बचाओ आंदोलन की प्रमुख शिल्पा सिंह ने dainikbhaskar.com से बातचीत में कहा कि कटिहार में महिला के साथ पकड़े गये दलाल और दूल्हे पुलिस की पकड़ में नहीं आते, अगर हमारे एनजीओ के कार्यकर्ता सक्रिय नहीं हुए होते। उनका कहना है कि पुलिस की सक्रियता इस बात पर निर्भर करती है कि इस मुहिम में शामिल एनजीओ की साख कैसी है।
जानकारी के अनुसार इन जिलों में पंचायत स्तर पर दलालों का नेटवर्क फैला हुआ है। नेटवर्क में शामिल दलाल पता लगाते रहते हैं कि किस गांव में किस घर में लड़की ब्याहने लायक है और पैसों के अभाव में उसके हाथ पीले नहीं हो पा रहे हैं। उन्होंने कहा कि बाहर के लोगों को बुलाकर यहां शादी कराना पुरानी बात हो गयी। अब दलालों के अपना फंडा बदल दिया है। वे संबंधित परिवार वालों को लड़की के साथ किसी दूसरी जगह चलने को राजी करते हैं और बाहर जाकर उनकी शादी किसी मर्द से करा दी जाती है। इसके एवज में परिवार वालों को कुछ पैसे दे दिये जाते हैं।
उधर, शादी के बाद उस महिला के खरीदने-बेचने का अंतहीन सिलसिला शुरू हो जाता है। दलालों को 10 से 15 हजार और परिवारवालों को 25 हजार रुपये दिये जाते हैं। शिल्पा सिंह ने बताया कि पूर्णिया के गांव महिला तस्करी के हब बनते जा रहे हैं। यह छानबीन का मामला है कि यह धंधा अब अररिया से पूर्णिया कैसे शिफ्ट हो गया। इसके पीछे क्या सामाजिक वजह है?