पटना. जिस जमाने में बाजा बजाने वाले दो-चार लोग बारात के आगे-आगे कुछ भी बजाते हुए चलते थे, उस समय पटना में अंग्रेजी पैटर्न के बैंड की शुरुआत की। करीब 84 साल पहले सन् 1930 में मो. मूसा ने इस बैंड की शुरुआत की थी। तब से लेकर आज तक मूसा बैंड बुलंदी पर ही काबिज है। बैंड की डिमांड प्रदेश के सभी जिलों और पड़ोसी राज्य नेपाल तक होती है। अंग्रेजों के जमाने में इस बैंड की मार्च पार्टी सबसे प्रसिद्ध थी।
खुशी के हर मौके पर बैंड का महत्व सबसे खास होता है, लोग इस मौके पर नंबर वन बैंड की ख्वाहिश रहते हैं। ऐसे में आज भी लोगों की जुबान पर सबसे लंबे समय से मूसा बैंड का नाम आता रहा है। सिटी के सुल्तानगंज मेन रोड के मूसा बैंड की प्रदेश में सबसे अलग पहचान है। किसी मौके पर इस बैंड का शामिल होना उस पार्टी या फिर फंक्शन के बड़े स्टे्टस की भी पहचान है। बैंड की सबसे मशहूर मार्च पार्टी में 16 कलाकार होते हैं, जो केवल राष्ट्र धुन बजाते हैं। मार्च पार्टी में फिल्मी गाना नहीं बजाया जाता है। मार्च पार्टी की डिमांड शौकीन लोग करते हैं। समय के साथ-साथ बैंड का अपना रूप और स्वरूप बदलता गया। मार्च पार्टी की लोकप्रियता धीरे-धीरे कम होने लगी।
साल 1970 के बाद बैंड ने ब्रास बैंड का रूप ले लिया। फिर शहनाई, भांगड़ा और ट्रॉली का चलन मार्केट में आया। मूसा बैंड को मो. मूसा ने 1930 से 2014 तक चलाया। पिछले साल उनके इंतकाल के बाद बैंड की कमान मो. मूसा के भतीजे मो. फैय्याज़ व नाती मो. अशरफ ने संभाली। मो. फैय्याज़ कहते हैं कि मूसा बैंड की सबसे बड़ी खासियत इसका अनुशासन है। पार्टी के सभी कलाकार स्वतंत्र रूप से भागीदारी निभाते हैं, लेकिन सामंजस्य और अनुशासन में कभी परेशानी नहीं आती।
लालू-पासवान-नीतीश...सभी की पसंद
मूसा बैंड प्रदेश के रसूखदार लोगों की पहली पसंद है। मूसा बैंड कई बड़े राजनेता, व्यापारी और डॉक्टरों के पारिवारिक विवाहों में मौजूदगी दर्ज करा चुका है। राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव की बड़ी बेटी मीसा भारती, पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के भांजे के विवाह में मूसा बैंड ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान समेत कई बड़े राजनेता अपनी पार्टियों में इसी बैंड को खोजते हैं। इसके अलावा शहर के ज्यादातर बड़े लोगों के यहां मूसा बैंड का जलवा रहता है।
नहीं मिलते मशकबिन बजाने वाले
मो. फैयाज के अनुसार पहले मशकबिन का जमाना था। कुछ वर्षों पहले तक मशकबिन बैंड की शोभा बढ़ाती थी। इसकी धुन लोगों को काफी आकर्षित करती थी। मशकबिन बजाना काफी मुश्किल होता है। आज के जमाने में इसे बजाने वाले नहीं रहे। आज के आधुनिक दौड़ में मशकबिन जैसे परंपरागत वाद्य यंत्र की जगह मशीनी वाद्य यंत्रों ने लेनी शुरू कर दी है।
कलाकारोंं को दी जाती है ट्रेनिंग
मो. मूसा के नाती मोहम्मद अशरफ बताते हैं कि बैंड के सभी कलाकारों को पहले ट्रेनिंग दी जाती है। ट्रेनिंग के दौरान बैंड में प्रयोग होने वाद्य यंत्रों से सही धुन निकालने के बारे में बताया जाता है। बैंड के सभी कलाकारों का एक साल के लिए कांट्रैक्ट होता है। इस दौरान वे केवल मूसा बैड के लिए ही काम करते हैं।
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