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रोटी को मोहताज है भोजपुरी शेक्सपियर परिवार, नौकरी के लिए भटक रहे बच्चे

भिखारी ठाकुर के प्रपौत्र सुशील कुमार आज एक अदद नौकरी के लिए मार फिर रहे हैं।

Dainik Bhaskar

Dec 18, 2014, 01:34 AM IST
भिखारी ठाकुर - फाइल फोटो भिखारी ठाकुर - फाइल फोटो
छपरा. भोजपुरी के शेक्सपियर कहे जाने वाले लोक कवि भिखारी ठाकुर का परिवार मुफलिसी में जी रहा है। देश ही नहीं विदेशों में भोजपुरी के क्षेत्र में ख्याति प्राप्त करने वाले भिखारी ठाकुर का परिवार गरीबी का दंश झेल रहा है। उनकी जयंती व पुण्यतिथि पर कुछ गणमान्य पहुंचते हैं, कार्यक्रम भी आयोजित होते हैं, लेकिन यह सब मात्र श्रद्धांजलि की औपचारिकता तक सिमट कर रह जाता है। न तो ऐसे किसी आयोजन में भिखारी ठाकुर के गांववासियों का दर्द कम होता है और न ही उनके परिजनों को कोई मदद मिल पाती है। इस बार भी मंत्री व प्रशासनिक अधिकारियों की शिरकत होगी। कार्यक्रमों के बीच आश्वासनों की झड़ी लगाई जाएगी, लेकिन इन सारी चीजों से परे हैं भिखारी ठाकुर के परिजन। कुतुबपुर दियारा स्थित उनका खपरैल घर जीर्ण-शीर्ण है।
नौकरी को भटक रहा प्रपौत्र
भिखारी ठाकुर के प्रपौत्र सुशील कुमार आज एक अदद नौकरी के लिए मार फिर रहे हैं। सुशील बताते हैं कि अगर फुआ और फूफा नहीं रहते तो शायद मैं एमए तक पढ़ाई नहीं कर पाता। रोटी की लड़ाई में मेरी पढ़ाई नेपथ्य में चली गई रहती। कलेक्ट्रेट में चतुर्थ वर्गीय कर्मचारी की नौकरी के लिए वे आवेदन कर चुके हैं। पैनल सूची में नाम भी है, लेकिन एक साल बीत गए, न जाने नौकरी कब मिलेगी।
हाल यह है कि विभिन्न कार्यक्रमों में उन्हें एवं उनके परिजन को मंच तक नहीं बुलाया जाता है। परिवार को हरेक जरूरत की दरकार है। एक ओर जहां सुशील जीविकोपार्जन के लिए दर-दर भटक रहे हैं वहीं, उनकी पुत्रवधू व सुशील की मां गरीबी का दंश झेल रही हैं। हर जयंती समारोह पर आश्वासनों की बात सुनते-सुनते अब उनके परिजनों की उम्मीदें भी धुंधली हो चुकी है। अब तो सरकारी कार्यक्रम में भी उनके परिजनों को निमंत्रण तक नहीं मिलता।
जयंती आज
लोककवि भिखारी ठाकुर की 127वीं जयंती समारोह कला संस्कृति विभाग द्वारा मनाया जाएगा। बिहार के कला संस्कृति विभाग के मंत्री विनय बिहारी व कलाकार शामिल होंगे। समारोह उनके पैतृक गांव कुतुबपुर में होगा।
न सुविधाएं हैं न समृद्धि
छपरा से करीब 25 किलोमीटर दूर स्थित कुतुबपुर गांव आज भी अंधेरे तले है। आस-पास दर्जनों गांव, हजारों की बस्ती, तीन पंचायतों में एक मात्र अपग्रेड हाईस्कूल। वह भी प्राथमिक विद्यालय से अपग्रेड हुआ है। प्रारंभिक शिक्षक और पढ़ाई हाईस्कूल तक। आगे की पढ़ाई के लिए नदी इस पार आना होता है। कुछ बच्चे तो आ जाते हैं, बच्चियां कहां जाएं। कुतुबपुर से सटे कोटवापट्टी रामपुर, रायपुरा, बिंदगोवा व बड़हरा महाजी अन्य पंचायतें हैं। लोगों की जीविका का मुख्य आधार कृषि है। अब नदी इनके खेतों को निगलने लगी है।
75 फीसद भूमिखंड में सरयू, गंगा नदी का राग है। टापू सदृश गांव है। 2010 से निर्माणाधीन छपरा आरा पुल से कुछ उम्मीद जगी है, लेकिन फिलहाल नाव से आने-जाने की व्यवस्था है। अस्पताल है ही नहीं। बाढ़ की तबाही अलग से झेलनी पड़ती है। प्रत्येक साल किसानों को परवल की खेती में बाढ़ आने पर लाखों-करोड़ों रुपयों का घाटा सहना पड़ता है। इस गांव में पक्की सड़क तक नहीं है।
आगे की स्लाइड्स में देखें भिखारी ठाकुर के गांव की फोटोज
भिखारी ठाकुर का परिवार आज इस झोपडी के सहारे गुजर बसर कर रहा है। भिखारी ठाकुर का परिवार आज इस झोपडी के सहारे गुजर बसर कर रहा है।
भिखारी ठाकुर की याद में उनके गांव में बना स्मारक। भिखारी ठाकुर की याद में उनके गांव में बना स्मारक।
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भिखारी ठाकुर - फाइल फोटोभिखारी ठाकुर - फाइल फोटो
भिखारी ठाकुर का परिवार आज इस झोपडी के सहारे गुजर बसर कर रहा है।भिखारी ठाकुर का परिवार आज इस झोपडी के सहारे गुजर बसर कर रहा है।
भिखारी ठाकुर की याद में उनके गांव में बना स्मारक।भिखारी ठाकुर की याद में उनके गांव में बना स्मारक।
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