हाजीपुर. विप्रो कंपनी के मालिक अजीम प्रेमजी से एक मुलाकात ने इंजीनियर उपेंद्र की सोच बदल दी। इस बदली सोच से उन्होंने अपनी किस्मत बदल ली। मुंबई के नरीमन प्वाइंट स्थित एक कंपनी में बतौर प्रोजेक्ट हेड काम कर रहे उपेंद्र के मन में उसी समय उद्यमी बनने का विचार आया। जिस कंपनी में वे काम करते थे वह कंपनी बड़ी-बड़ी बिल्डिंगों के लिए दरवाजे और खिड़कियां बनाती थी। इस कंपनी को अजीम प्रेमजी की कंपनी के ऑफिस के लिए दरवाजे और खिड़कियों का आर्डर मिला। इसी दौरान उपेंद्र की मुलाकात अजीम प्रेमजी से हुई। उनके मन में उद्यमी बनने का विचार उठा। कुछ दिनाें बाद उपेंद्र ने लाखों की तनख्वाह की नौकरी छोड़ दी।
वे अपने गांव वैशाली जिले के हाजीपुर प्रखंड के फुलपुरा आ गए। अपने हुनर का भरपूर इस्तेमाल किया। गांव स्थित घर पर ही ग्लेबनाईज्ड शीट से बने दरवाजे और खिड़कियों का निर्माण शुरू कर दिया। छोटे-छोटे ऑर्डर से शुरू की गई इस कंपनी का टर्न ओवर वर्तमान में सालाना अस्सी लाख के अासपास पहुंच गया है। उपेंद्र ने महज दस सालों के अंतराल में उद्यमिता विकास की यह गाथा लिखी। उपेंद्र की कंपनी अनमोल एंटरप्राइजेज को अब बिहार के अलावा यूपी, असम, मध्यप्रदेश व बंगाल से भी ऑर्डर मिलते हैं। पांच एकड़ में फैली कंपनी से प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से तकरीबन सौ लोग जुड़े हैं। इसी कंपनी से इनका परिवार आबाद है।
सोचा कुछ ऐसा करूं जिससे मैं भी उद्यमी कहलाऊं: उपेंद्र
असम इंजीनियरिंग कॉलेज गुवाहटी से सिविल इंजीनियरिंग करने के बाद आम युवक की तरह उपेंद्र भास्कर भी काम की तलाश में मुंबई गए। बारह साल वहां एक कंपनी में काम किया। उपेंद्र ने बताया कि विप्रो कंपनी के मालिक अजीम प्रेमजी के एक ऑफिस के कन्स्ट्रक्शन के दौरान उनसे मुलाकात हुई। उनसे मुलाकात के बाद मेरे भी मन मे आया कि काश मैं भी उद्यमी होता। उद्यमी बनने का ख्याल मन में रमता गया। चकसिकंदर बाजार से सटे गांव में पांच एकड़ जमीन ले ली और वहां इस फैक्ट्री काे व्यवस्थित रूप दिया।
उपेंद्र ने बताया कि शुरुआती दौर में सरकारी बिल्डिंगों के लिए ही ऑर्डर आते थे। लेकिन दरवाजे और खिड़कियों की मजबूती और किफायती होने के कारण अब लोग अपने घरों में भी लोहे के शीट से बने दरवाजे लगाने लगे। इसकी खूब डिमांड हो रही है। खिड़कियां भी बनाई जाती है। दरवाजे और खिड़कियों को डिजाइन करने के लिए जर्मनी से मशीनें भी मंगाई गई हैं।
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