(फाइल फोटोः जीतन राम मांझी और नीतीश कुमार।)
पटना. बिहार के मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी अब पूर्व मुख्यमंत्री हो सकते हैं।
पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जदयू विधायक दल के नए नेता चुन लिए गए हैं और अब वह सरकार बनाने का दावा पेश करेंगे। मांझी ने शुक्रवार को कहा था कि महाभारत में द्रौपदी का चीरहरण होता रहा और भीष्म पितामह चुपचाप देखते रहे। इसी का नतीजा था कि महाभारत हुआ। अब बिहार में भी वैसे ही हालात बन रहे हैं। जदयू के लोग मुझे हटाने की साजिश कर रहे हैं और नीतीश कुमार भीष्म पितामह की तरह चुपचाप देख रहे हैं। शनिवार को भी उन्होंने अपनी ओर से 'महाभारत' में कोई कमी नहीं छोड़ी। कैबिनेट की बैठक बुला कर विधानसभा भंग करने का प्रस्ताव पारित करा लिया। पर नीतीश खेमा भी अड़ा रहा। कैबिनेट की बैठक से नीतीश समर्थक मंत्रियों ने वॉकआउट किया और बाद में विधानमंडल दल की बैठक में नीतीश को नेता चुन लिया। आखिर इस 'महाभारत' की स्थिति क्यों बनी?
1. कामकाज के तरीके में अंतर: नीतीश और मांझी की राजनीतिक और प्रशासनिक शैलियों में भारी अंतर ने इन दोनों नेताओं के बीच दुराव पैदा कर दिया। मांझी की राजनीतिक महत्वाकांक्षा ने इस आग में घी का काम किया। अब तो जदयू के सर्वोच्च नेता नीतीश कुमार के सामने सिर्फ सरकार बचाने की नहीं बल्कि अपनी पार्टी बचाने की भी समस्या है।
2. बदली सरकार की छवि: गत लोक सभा चुनाव के बाद नीतीश कुमार ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देकर जीतन राम मांझी को मुख्यमंत्री बनवाया था। तब नीतीश कुमार ने यह उम्मीद की थी कि मांझी बिहार विधान सभा के अगले चुनाव तक ही मुख्यमंत्री पद पर बने रहेंगे और यदि अक्तूबर-नवंबर 2015 के चुनाव में जदयू को बहुमत मिला तो वह (नीतीश) खुद एक बार फिर मुख्यमंत्री बन जाएंगे। इस आशय का प्रस्ताव तब जदयू विधायक दल ने पारित भी किया था। नीतीश कुमार को उम्मीद थी कि इस बीच जीतन राम मांझी उसी शैली में राज चलाते रहेंगे जैसा शासन खुद नीतीश कुमार ने आठ साल तक चलाया था। नीतीश का शासन न्याय के साथ विकास और बेहतर कानून-व्यवस्था के लिए जाना जाता है। पर मुख्यमंत्री बनने के बाद मांझी ने नीतीश की उम्मीद पूरी नहीं की। हाल के दिनों में नीतीश और मांझी के बीच संवाद भी कम ही रहा। नीतीश कुमार के करीबी लोगों का आरोप है कि विकास बैकफुट पर चला गया और राज्य में कानून-व्यवस्था की स्थिति काफी गड़बड़ हो गई। भाजपा ने यह आरोप लगाना शुरू कर दिया कि अब जंगल राज-2 कायम हो गया है। लालू-राबड़ी के शासन काल को जंगल राज-1 माना गया था।
3. ऊटपटांग बयान: नीतीश कुमार जदयू के एकछत्र नेता हैं। जदयू सरकार का जो भी जन समर्थन है, वह मुख्यतः कुमार के कारण ही है। उनके समर्थकों का यह आरोप रहा है कि जीतन राम मांझी के कथित ऊटपटांग कामों और बयानों से रोज-रोज जदयू के वोट कम हो रहे हैं। खबर है कि राजद और जदयू के अनेक प्रमुख नेताओं ने जीतन राम मांझी से कहा कि वे अपनी कार्य शैली और बयान शैली बदलें। पर मांझी पर उसका कोई असर नहीं पड़ा। नीतीश कुमार खेमे के सामने यह दुविधा रही कि वह मांझी को अगले चुनाव तक मुख्यमंत्री बने रहने देकर अपने वोट घटाए या फिर खतरा उठा कर उन्हें हटवाने की कोशिश करे।
4. लगातार विवादित रहे: आठ साल के शासनकाल में नीतीश कुमार व्यक्तिगत कारणों से कभी विवाद में नहीं रहे। पर कभी जन्म तिथि को लेकर तो कभी उनके किसी परिजन के विवादास्पद कामों को लेकर मांझी विवादों में ही रहे। इससे नीतीश कुमार परेशान होते रहे, क्योंकि इससे भाजपा को बल मिलता रहा। ऐसे भी लोक सभा चुनाव में बिहार में 40 में से 31 सीटें जीत कर राजग दबाव बनाए हुए है।
5. मुख्यमंत्री बनने के बाद मांझी ने दलितों के लिए कुछ विशेष कदम उठाए। मांझी ने उनकी राजनीतिक ताकत का अहसास कराने के लिए कई बयान भी दिए। इससे दलितों में जागरण बढ़ा। वे खुश हुए। मांझी को अपना वोट बैंक बनता नजर आया। इससे जीतन राम मांझी का राजनीतिक हौसला बढ़ा। महत्वाकांक्षा भी। मांझी ने कहा कि मेरा कर्त्तव्य तो कहता है कि अगला सी.एम. नीतीश कुमार बनें, पर मेरी भावना कहती है कि अगला सीएम दलित ही बने। बिहार में दलितों की आबादी 22 प्रतिशत है। उनमें पूरा जागरण आ जाए तो उनकी इच्छा के खिलाफ जाकर कोई व्यक्ति मुख्यमंत्री नहीं बन सकता। ऐसे बयान के बाद नीतीश खेमे को मांझी के खिलाफ कदम उठाना ही था। वही हो रहा है। अंततः इसका क्या नतीजा निकलेगा, यह देखना दिलचस्प होगा।
(लेखक दैनिक भास्कर, पटना के सलाहकार संपादक हैं)