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डाउनलोड करेंपटना. सिर पर पिता का साया नहीं, आंखों में रोशनी भी नहीं। आर्थिक स्थिति ऐसी कि हौसला रास्ते में दम तोड़ दे। लेकिन उसने जीवनपथ के हर कंकड़ को मील का पत्थर बना लिया। अदम्य इच्छाशक्ति से उम्मीदों की ऐसी मशाल जलाई कि आज उसकी रोशनी में उसके दिवंगत पिता के सपने साफ पूरे होते दिख रहे हैं।
बाढ़ के विनय कुमार की कहानी शारीरिक नि:शक्तता झेल रहे लाखों इंसानों के लिए प्रेरणा बन सकती है। जन्मांध विनय को बुधवार को पटना विश्वविद्यालय में आयोजित दीक्षांत समारोह में पीएचडी की डिग्री दी गई।
देख नहीं सकते, सुन तो सकते हैं...
बकौल विनय 'पिता का सपना था कि लेक्चरर बनूं जो अब पूरा होता दिख रहा है।Ó लेकिन इस सफर में विनय को कम परेशानियां नहीं उठानी पड़ीं। पिता एक शिक्षक थे। खुद की लाचारी ऐसी कि प्रारंभिक कक्षाओं में दाखिला मिलना मुश्किल था। ब्रेल लिपि से दसवीं तक पढ़े। दिमाग तेज था इसलिए कॉलेज की कक्षाओं में जो सुन लेते, बैठ जाता। शिक्षकों ने क्लास के अलावा डीवीडी के जरिए पाठों को सुनने का सुझाव दिया। विनय बताते हैं कि इससे बहुत फायदा हुआ। जिंदगी ही बदल गई। डीवीडी से ही तैयारी शुरू की। परीक्षाओं में राइटर की मदद ली। स्नातक, स्नातकोत्तर की बाधाओं को पार कर गए।
तंगहाली ने किया रोजगार खोजने को मजबूर
पिताजी का निधन हो चुका था। खर्च अधिक, गरीबी, तंगहाली ने रोजगार खोजने पर मजबूर किया। शिक्षक नियोजन प्रक्रिया में शामिल हुए। नियुक्ति हो गई। बाद में पूर्णकालिक शिक्षक के रूप में भी उनकी नियुक्ति कर दी गई। लेकिन पिता का सपना अभी अधूरा था। पीएचडी के लिए पटना विवि में अप्लाई किया। इतिहास विभाग से 'भारतीय इतिहास के संदर्भ में भोजपुरी गीतों का बदलता स्वरूप विषय पर शोध किया। बहरहाल डिग्री तो मिल गई लेकिन, विनय का लक्ष्य अभी बाकी है। लेक्चरर बनने के लिए वे जी जान से जुटे हैं। हौसला ऐसा है कि अपनों के अलावा खुद विनय को भी पक्का यकीन है कि लेक्चरर बनने का सपना भी जल्द पूरा होगा।
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